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नज़्म
सरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदा
ख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
न पागल हूँ न मजनूँ हूँ न है कोई मरज़ मुझ को
अमल पैरा हूँ मैं जिस पर पुराना इक मक़ूला है
सय्यद हशमत सुहैल
नज़्म
माह-पारों का हदफ़ ज़ोहरा-जबीनों का शिकार
नग़्मा-पैरा ओ नवासंज ओ ग़ज़ल-ख़्वाँ हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
बातिन-ए-ज़ुल्मत में हैं सूरज की किरनें बे-क़रार
रात को हंगामा-पैरा-ए-सहर पाता हूँ मैं
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
चाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीम
पहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीम