aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "pal.de"
खरी बातों का ज़ाइक़ा तुर्श होता हैब-हैसियत इंसानऔरत की ज़रूरतकिसी मर्द को नहींवो गिरवी रखी जाएया बेच दी जाएकिराए पे ली जाएया यक-मुश्त ख़रीद ली जाएउस के ख़यालात कीबंदर-बाँट मुमकिन नहींहुक्म की पाबंदी का तौक़ पहन करजीवन की कुटिया काकिराया अदा करते हुएअगर औरत कमा सकती तोलाती मर्द के लिए ख़रीद करवो हौसलाकि जिस से वो अपना चेहराउस के ख़याल आईने में देख सकताना-ख़ुश तमाम बातों कोइंसाफ़ के पलड़े में तौल सकताअदम-ए-तहफ़्फ़ुज़ के पिंजरे मेंतीसरे दर्जे के क़ैदी की हैसियत सेअगर औरत कमा सकती तोलाती मर्द के लिए ख़रीद करवो मोहब्बतजो उस की फ़ितरी ज़रूरत से मावरा होतीअगर औरत कमा सकती तो
कोई ऐसा स्कूल भी तो खुलेजहाँ कापियाँ और किताबें न होंदीवारों पे लिक्खा हो पढ़ना नहींतरक़्क़ी के ज़ीने पे चढ़ना नहींरह-ए-इल्म में आगे बढ़ना नहींगले मेरे ये इल्म मढ़ना नहींहमेशा रहें ख़ुश कि ऐ चुल-बुलेकोई ऐसा स्कूल भी तो खुलेहमें न सिखाओ ये जी ओ टी गॉटहमारा तो ग़ुस्सा है ऐच ओ टी हॉटकि हम तोड़ डालें ये पी ओ टी पॉटछिड़क देंगे चेहरे पे हम इंकपॉटपड़े दाग़ ऐसा कि फिर न धुलेकोई ऐसा स्कूल भी तो खुलेन करनी पड़े याद ये हिस्ट्रीन जुग़राफ़िया हो और न कैमिस्ट्रीवकालत करेंगे न बैरिस्ट्रीसिखा दो शरारत की पामिस्ट्रीकि शैतान बनने पे हम हैं तुलेकोई ऐसा स्कूल भी तो खुलेबड़े हो के भालू नचाएँगे हमअखाड़े में मुगदर घुमाएँगे हमन पढ़ने को इंग्लैण्ड जाएँगे हमतुम्हीं पर कबूतर उड़ाएँगे हमजहालत के पलड़े में हम हैं तुलेकोई ऐसा स्कूल भी तो खुले
बहुत सी आवाज़ जमा कर केएक चीख़ बनाई जा सकती हैबहुत थोड़े लफ़्ज़ों सेएक बाग़ी नज़्म बनाई जा सकती हैलेकिनज़िंदा क़ब्रिस्तान में एक नज़्म का कतबा काफ़ी नहींक़ब्रें दम साधे पड़ी हैंहमारी माएँ मुर्दा बच्चों को जन्म दे रही हैंलाशें शनाख़्त करते हुए हुजूम अपना चेहराभूल जाता है!हम ज़िंदगी से सोहबत करने निकले थेऔर ज़िंदगी ने हमारे ख़ुसियों से केंचे बना लिएहमारे लहू में च्यूंटियाँ रेंगती हैंमगर हम अपनी मर्ज़ी से खुजली तक नहीं कर सकतेक़तार में खड़े खड़े हम दूसरों से मुख़्तलिफ़ कैसे हो गए!!!ज़िंदगी मीज़ान होती तो हम उस के पलड़े अपने वजूदों से भर देतेमगर क्या करें कि हम ख़ुद अपनी नज़रों में बहुत बे-वज़्न थेहथेलियों में सुराख़ हों तो आँखें कहाँ सँभालेंहम ने सिर्फ़ चेहरे निभाए रिश्ते नहींप्यासी ज़मीनों में आँसू काश्त कर के भीबूँद भर हरियाली नहीं खिलीहम सारी उम्र अपने ख़्वाबों के जोलाहे बने रहेऔर अपने बच्चों के लिए एक साया-दार परचम न बुन सकेहमारी मिट्टी महज़ मिट्टी रहीकभी वतन न बन पाई!!!
मेरी माँ मौत की आग़ोश में भी ख़ूबसूरत थीमुजस्सम शुक्र-ओ-ईसार-ओ-वफ़ाजो ज़िंदगी-भर ख़ुद झुलस कर हम को ठंडी छाँव दी थीअब उस की चाँद सी रौशन जबीं परदर्द की गहरी शिकन सी आ गई थीफिर भी उस का ज़र्द चेहरा पुर-सुकूँ थावो जब तक होश में थाउस के होंटों पर दुआएँउस की आँखों में मोहब्बत थीमिरी माँ मौत की आग़ोश में भी ख़ूबसूरत थीउसे इक दूसरी दुनिया में पैदाइश की जल्दी थीहमें ये ज़िद कि हम को छोड़ कर जाने नहीं पाएउसी रस्सा-कशी मेंउस का दिल और जिस्मउस के होंट उस की रूह ज़ख़्मी हो चुके थेछिल चुके थेफिर भी उस ने अपना सारा बोझउस पलड़े में डाला थाजहाँ हम सब इकट्ठे मिल के उस को अपनी दुनियाअपनी इस बे-फ़ैज़ दुनिया में घसीटे जा रहे थे
मैं ने आख़िरी मिस्राहातिफ़ को दान कियाऔर सब्ज़ औरत की नीली आँखों मेंतहसीन की नक़दी तलाश करने लगाउस ने फ़स्लों पे करम करते हाथ सेहवा में तराज़ू बनायाएक पलड़े मेंमेरा हर्फ़-ए-हुनर रखाऔर दूसरे मेंअपने जमाल की नक़दीउस के जमाल का सब्ज़ दरियामेरे दामन में बहने लगा
कोई तराज़ू हैजिस का शाहीं कहीं नहीं हैज़माना गहरा कुआँ घड़ी की 'अज़ीम और ला-ज़वाल टिक-टिककी लाल कठिनाईयाँज़मीं की निहायतें औरअलग कमरे में खेलते बे-नियाज़ बच्चे और उन की आयासब एक पलड़े से जुड़ रहे हैंऔरएक पलड़े में दुबली-पतली शगुन भरी हैशगुन भरी ख़्वाब से जड़ी है
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
दीप जिस का महल्लात ही में जलेचंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चलेवो जो साए में हर मस्लहत के पलेऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर कोमैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहरवो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहींये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले करचले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहींफ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िलकहीं तो होगा शब-ए-सुस्त-मौज का साहिलकहीं तो जा के रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म दिलजवाँ लहू की पुर-असरार शाह-राहों सेचले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़ेदयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों सेपुकारती रहीं बाहें बदन बुलाते रहेबहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगनबहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामनसुबुक सुबुक थी तमन्ना दबी दबी थी थकन
दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रबक्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया होशोरिश से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेराऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा होमरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरीदामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा होआज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँदुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया होलज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों मेंचश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा होगुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी कासाग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा होहो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौनाशरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा होमानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुलनन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा होसफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे होंनद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा होहो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारापानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता होआग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ाफिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा होपानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनीजैसे हसीन कोई आईना देखता होमेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन कोसुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा होरातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दमउम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया होबिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा देजब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ होपिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िनमैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा होकानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँरौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा होफूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू करानेरोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ होइस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नालेतारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा होहर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला देबेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे
1वो सुब्ह कभी तो आएगीइन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगाजब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगाजब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्मे गाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीजिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर कर जीते हैंजिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैंइन भूकी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीमाना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहींमिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहींइंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तौली जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीदौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगाचाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगाअपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीबीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूक के और बेकारी केटूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी केजब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीमजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगामासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगाहक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगीफ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगेसीनों के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगेये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बनाई जाएगीवो सुब्ह कभी तो आएगी2वो सुब्ह हमीं से आएगीजब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगेजब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बंधन टूटेंगेउस सुब्ह को हम ही लाएँगे वो सुब्ह हमीं से आएगीवो सुब्ह हमीं से आएगीमनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जाएँगेजब हाथ न काटे जाएँगे जब सर न उछाले जाएँगेजेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगीवो सुब्ह हमीं से आएगीसंसार के सारे मेहनत-कश खेतों से मिलों से निकलेंगेबे-घर बे-दर बे-बस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगेदुनिया अम्न और ख़ुश-हाली के फूलों से सजाई जाएगीवो सुब्ह हमीं से आएगी
कोई सफ़्हा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती हैकई लफ़्ज़ों के मअ'नी गिर पड़े हैंबिना पत्तों के सूखे तुंड लगते हैं वो सब अल्फ़ाज़जिन पर अब कोई मअ'नी नहीं उगतेबहुत सी इस्तेलाहें हैं
न तुम को अपने ख़द-ओ-ख़ाल ही नज़र आएँन मैं ये देख सकूँ जाम में भरा क्या हैबसारतों पे वो जाले पड़े कि दोनों कोसमझ में कुछ नहीं आता कि माजरा क्या है
उठ्ठो मिरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दोकाख़-ए-उमरा के दर ओ दीवार हिला दोगर्माओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं सेकुन्जिश्क-ए-फ़रोमाया को शाहीं से लड़ा दोसुल्तानी-ए-जम्हूर का आता है ज़मानाजो नक़्श-ए-कुहन तुम को नज़र आए मिटा दोजिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ीउस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दोक्यूँ ख़ालिक़ ओ मख़्लूक़ में हाइल रहें पर्देपीरान-ए-कलीसा को कलीसा से उठा दोहक़ रा ब-सजूदे सनमाँ रा ब-तवाफ़ेबेहतर है चराग़-ए-हरम-ओ-दैर बुझा दोमैं ना-ख़ुश ओ बे-ज़ार हूँ मरमर की सिलों सेमेरे लिए मिट्टी का हरम और बना दोतहज़ीब-ए-नवी कारगह-ए-शीशागराँ हैआदाब-ए-जुनूँ शाइर-ए-मशरिक़ को सिखा दो
सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता हैसुना है शेर का जब पेट भर जाए तो वो हमला नहीं करतादरख़्तों की घनी छाँव में जा कर लेट जाता हैहवा के तेज़ झोंके जब दरख़्तों को हिलाते हैंतो मैना अपने बच्चे छोड़ करकव्वे के अंडों को परों से थाम लेती हैसुना है घोंसले से कोई बच्चा गिर पड़े तो सारा जंगल जाग जाता हैसुना है जब किसी नद्दी के पानी मेंबए के घोंसले का गंदुमी साया लरज़ता हैतो नद्दी की रुपहली मछलियाँ उस को पड़ोसन मान लेती हैंकभी तूफ़ान आ जाए, कोई पुल टूट जाए तोकिसी लकड़ी के तख़्ते परगिलहरी, साँप, बकरी और चीता साथ होते हैंसुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता हैख़ुदावंदा! जलील ओ मो'तबर! दाना ओ बीना मुंसिफ़ ओ अकबर!मिरे इस शह्र में अब जंगलों ही का कोई क़ानून नाफ़िज़ कर!कोई दस्तूर नाफ़िज़ कर
तुम आज हज़ारों मील यहाँ से दूर कहीं तन्हाई मेंया बज़्म-ए-तरब-आराई मेंमेरे सपने बुनती होंगी बैठी आग़ोश पराई मेंऔर मैं सीने में ग़म ले कर दिन-रात मशक़्क़त करता हूँजीने की ख़ातिर मरता हूँअपने फ़न को रुस्वा कर के अग़्यार का दामन भरता हूँमजबूर हूँ मैं मजबूर हो तुम मजबूर ये दुनिया सारी हैतन का दुख मन पर भारी हैइस दौर में जीने की क़ीमत या दार-ओ-रसन या ख़्वारी हैमैं दार-ओ-रसन तक जा न सका तुम जेहद की हद तक आ न सकींचाहा तो मगर अपना न सकींहम तो दो ऐसी रूहें हैं जो मंज़िल-ए-तस्कीं पा न सकेंजीने को जिए जाते हैं मगर साँसों में चिताएँ जलती हैंख़ामोश वफ़ाएँ जलती हैंसंगीन हक़ाइक़-ज़ारों में ख़्वाबों की रिदाएँ जलती हैंऔर आज जब इन पेड़ों के तले फिर दो साए लहराए हैंफिर दो दिल मिलने आए हैंफिर मौत की आँधी उट्ठी है फिर जंग के बादल छाए हैंमैं सोच रहा हूँ इन का भी अपनी ही तरह अंजाम न होइन का भी जुनूँ नाकाम न होइन के भी मुक़द्दर में लिखी इक ख़ून में लिथड़ी शाम न होसूरज के लहू में लिथड़ी हुई वो शाम है अब तक याद मुझेचाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझेहमारा प्यार हवादिस की ताब ला न सकामगर उन्हें तो मुरादों की रात मिल जाएहमें तो कश्मकश-ए-मर्ग-ए-बे-अमाँ ही मिलीउन्हें तो झूमती गाती हयात मिल जाएबहुत दिनों से है ये मश्ग़ला सियासत काकि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जाएँबहुत दिनों से ये है ख़ब्त हुक्मरानों काकि दूर दूर के मुल्कों में क़हत बो जाएँबहुत दिनों से जवानी के ख़्वाब वीराँ हैंबहुत दिनों से सितम-दीदा शाह-राहों मेंनिगार-ए-ज़ीस्त की इस्मत पनाह ढूँढती हैचलो कि आज सभी पाएमाल रूहों सेकहें कि अपने हर इक ज़ख़्म को ज़बाँ कर लेंहमारा राज़ हमारा नहीं सभी का हैचलो कि सारे ज़माने को राज़-दाँ कर लेंचलो कि चल के सियासी मुक़ामिरों से कहेंकि हम को जंग-ओ-जदल के चलन से नफ़रत हैजिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आएहमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत हैकहो कि अब कोई क़ातिल अगर इधर आयातो हर क़दम पे ज़मीं तंग होती जाएगीहर एक मौज-ए-हवा रुख़ बदल के झपटेगीहर एक शाख़ रग-ए-संग होती जाएगीउठो कि आज हर इक जंग-जू से ये कह देंकि हम को काम की ख़ातिर कलों की हाजत हैहमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक़ नहींहमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत हैकहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख़ न करेअब इस जगह कोई कुँवारी न बेची जाएगीये खेत जाग पड़े उठ खड़ी हुईं फ़स्लेंअब इस जगह कोई क्यारी न बेची जाएगीये सर-ज़मीन है गौतम की और नानक कीइस अर्ज़-ए-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभीहमारा ख़ून अमानत है नस्ल-ए-नौ के लिएहमारे ख़ून पे लश्कर न पल सकेंगे कभीकहो कि आज भी हम सब अगर ख़मोश रहेतो इस दमकते हुए ख़ाक-दाँ की ख़ैर नहींजुनूँ की ढाली हुई एटमी बलाओं सेज़मीं की ख़ैर नहीं आसमाँ की ख़ैर नहींगुज़िश्ता जंग में घर ही जले मगर इस बारअजब नहीं कि ये तन्हाइयाँ भी जल जाएँगुज़िश्ता जंग में पैकर जले मगर इस बारअजब नहीं कि ये परछाइयाँ भी जल जाएँतसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
ये धूम-धड़क्का साथ लिए क्यूँ फिरता है जंगल जंगलइक तिनका साथ न जावेगा मौक़ूफ़ हुआ जब अन्न और जलघर-बार अटारी चौपारी क्या ख़ासा नैन-सुख और मलमलचलवन पर्दे फ़र्श नए क्या लाल पलंग और रंग-महलसब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
जहाँ-ज़ाद नीचे गली में तिरे दर के आगेये मैं सोख़्ता-सर हसन-कूज़ा-गर हूँ!तुझे सुब्ह बाज़ार में बूढ़े अत्तार यूसुफ़की दुक्कान पर मैं ने देखातो तेरी निगाहों में वो ताबनाकीथी मैं जिस की हसरत में नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँजहां-ज़ाद नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँ!ये वो दौर था जिस में मैं नेकभी अपने रंजूर कूज़ों की जानिबपलट कर न देखावो कूज़े मेरे दस्त-ए-चाबुक के पुतलेगिल-ओ-रंग-ओ-रोग़न की मख़्लूक़-ए-बे-जाँवो सर-गोशियों में ये कहतेहसन कूज़ा-गर अब कहाँ है?वो हम से ख़ुद अपने अमल सेख़ुदा-वंद बन कर ख़ुदाओं के मानिंद है रू-ए-गरदाँ!जहाँ-ज़ाद नौ साल का दौर यूँ मुझ पे गुज़राकि जैसे किसी शहर-ए-मदफ़ून पर वक़्त गुज़रेतग़ारों में मिट्टीकभी जिस की ख़ुश्बू से वारफ़्ता होता था मैंसंग-बस्ता पड़ी थीसुराही-ओ-मीना-ओ-जाम-ओ-सुबू और फ़ानूस ओ गुल-दाँमिरी हेच-माया मईशत के इज़हार-ए-फ़न के सहारेशिकस्ता पड़े थेमैं ख़ुद मैं हसन कूज़ा-गर पा-ब-गिल ख़ाक-बर-सर बरहनासर-ए-चाक ज़ोलीदा-मू सर-ब-ज़ानूकिसी ग़म-ज़दा देवता की तरह वाहिमा केगिल-ओ-ला से ख़्वाबों के सय्याल कूज़े बनाता रहा थाजहाँ-ज़ाद नौ साल पहलेतू नादाँ थी लेकिन तुझे ये ख़बर थीकि मैं ने हसन कूज़ा-गर नेतिरी क़ाफ़ की सी उफ़ुक़-ताब आँखोंमें देखी है वो ताबनाकीकि जिस से मेरे जिस्म ओ जाँ अब्र ओ महताब कारह-गुज़र बन गए थेजहाँ-ज़ाद बग़दाद की ख़्वाब-गूँ रातवो रूद-ए-दजला का साहिलवो कश्ती वो मल्लाह की बंद आँखेंकिसी ख़स्ता-जाँ रंज-बर कूज़ा-गर के लिएएक ही रात वो कुहरबा थीकि जिस से अभी तक है पैवस्त उस का वजूदउस की जाँ उस का पैकरमगर एक ही रात का ज़ौक़ दरिया की वो लहर निकलाहसन कूज़ा-गर जिस में डूबा तो उभरा नहीं है!
तुम्हें उदास सा पाता हूँ मैं कई दिन सेन जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुमवो शोख़ियाँ वो तबस्सुम वो क़हक़हे न रहेहर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुमछुपा छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनीख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गई हो तुममेरी उमीद अगर मिट गई तो मिटने दोउमीद क्या है बस इक पेश-ओ-पस है कुछ भी नहींमिरी हयात की ग़मगीनियों का ग़म न करोग़म-ए-हयात ग़म-ए-यक-नफ़स है कुछ भी नहींतुम अपने हुस्न की रानाइयों पे रहम करोवफ़ा फ़रेब है तूल-ए-हवस है कुछ भी नहींमुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूँ शिकायत होमिरी फ़ना मिरे एहसास का तक़ाज़ा हैमैं जानता हूँ कि दुनिया का ख़ौफ़ है तुम कोमुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया हैयहाँ हयात के पर्दे में मौत पलती हैशिकस्त-ए-साज़ की आवाज़ रूह-ए-नग़्मा हैमुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहींमिरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुमये तुम ने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँमगर मुझे ये बता दो कि क्यूँ उदास हो तुमख़फ़ा न होना मिरी जुरअत-ए-तख़ातुब परतुम्हें ख़बर है मिरी ज़िंदगी की आस हो तुममिरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगामगर ख़ुदा के लिए तुम असीर-ए-ग़म न रहोहुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लियायहाँ पे कौन हुआ है किसी का सोचो तोमुझे क़सम है मिरी दुख-भरी जवानी कीमैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दोमैं अपनी रूह की हर इक ख़ुशी मिटा लूँगामगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकतामैं ख़ुद को मौत के हाथों में सौंप सकता हूँमगर ये बार-ए-मसाइब उठा नहीं सकतातुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझेनजात जिन से मैं इक लहज़ा पा नहीं सकताये ऊँचे ऊँचे मकानों की डेवढ़ियों के तलेहर एक गाम पे भूके भिकारीयों की सदाहर एक घर में है अफ़्लास और भूक का शोरहर एक सम्त ये इंसानियत की आह-ओ-बुकाये कार-ख़ानों में लोहे का शोर-ओ-ग़ुल जिस मेंहै दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्माये शाह-राहों पे रंगीन साड़ियों की झलकये झोंपड़ों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशेये माल-रोड पे कारों की रेल-पेल का शोरये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्द-रू बच्चेगली गली में ये बिकते हुए जवाँ चेहरेहुसैन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छाई हुईये जंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँख़रीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिन कीये बात बात पे क़ानून ओ ज़ाब्ते की गिरफ़्तये ज़िल्लतें ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरीये ग़म बहुत हैं मिरी ज़िंदगी मिटाने कोउदास रह के मिरे दिल को और रंज न दो
वक़्त के अगले शहर के सारे बाशिंदेसब दिन सब रातेंजो तुम से ना-वाक़िफ़ होंगेवो कब मेरी बात सुनेंगेमुझ से कहेंगेजाओ अपनी राह लो राहीहम को कितने काम पड़े हैंजो बीती सो बीत गईअब वो बातें क्यूँ दोहराते होकंधे पर ये झोली रक्खेक्यूँ फिरते हो क्या पाते होमैं बे-चाराइक बंजाराआवारा फिरते फिरते जब थक जाऊँगातन्हाई के टीले पर जा कर बैठूँगाफिर जैसे पहचान के मुझ कोइक बंजारा जान के मुझ कोवक़्त के अगले शहर के सारे नन्हे-मुन्ने भोले लम्हेनंगे पाँवदौड़े दौड़े भागे भागे आ जाएँगेमुझ को घेर के बैठेंगेऔर मुझ से कहेंगेक्यूँ बंजारेतुम तो वक़्त के कितने शहरों से गुज़रे होउन शहरों की कोई कहानी हमें सुनाओउन से कहूँगानन्हे लम्हो!एक थी रानीसुन के कहानीसारे नन्हे लम्हेग़मगीं हो कर मुझ से ये पूछेंगेतुम क्यूँ इन के शहर न आईंलेकिन उन को बहला लूँगाउन से कहूँगाये मत पूछोआँखें मूँदोऔर ये सोचोतुम होतीं तो कैसा होतातुम ये कहतींतुम वो कहतींतुम इस बात पे हैराँ होतींतुम उस बात पे कितनी हँसतींतुम होतीं तो ऐसा होतातुम होतीं तो वैसा होता
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books