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नज़्म
तोड़ डालूँगा मैं ज़ंजीर-ए-असीरान-ए-क़फ़स
दहर को पंजा-ए-उस्रत से छुड़ाने दे मुझे
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
बे-तकल्लुफ़ हैं नज़र के सामने दीवार-ओ-दर
पंजा-ए-ख़ुर्शीद से टुकड़े है दामान-ए-सहर
नख़्शब जार्चवि
नज़्म
वो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब को
हवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
शबनम-ए-नोक-ए-मिज़ा ने भी ये महसूस किया
हर ग़ज़ल गौहर-ए-नायाब है 'ग़ालिब' की ग़ज़ल
मोहम्मद अब्दुल क़ादिर अदीब
नज़्म
कहाँ तक साँस की डोरी से रिश्ते झूट के बाँधें
किसी के पंजा-ए-बे-दर्द ही से टूट जाने दो
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
तेरे दम से फिर वतन वालों में पैदा हो हयात
पंजा-ए-अग़्यार से हो हिन्द को हासिल नजात
अल्ताफ़ मशहदी
नज़्म
मक़्तल में कुछ तो रंग जमे जश्न-ए-रक़्स का
रंगीं लहू से पंजा-ए-सय्याद कुछ तो हो