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नज़्म
जिस तरह सूख के ज़ख़्मों से गिरा करती है पपड़ी
उस की दीवारों से इस तरह से गिरता है प्लस्तर
गुलज़ार
नज़्म
हूक सी सीने में उठ्ठी चोट सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ