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नज़्म
क्यूँ उठा है जिंस-ए-शायर के परखने के लिए
क्या शमीम-ए-सुम्बुल-ओ-नस्रीं है चखने के लिए
जोश मलीहाबादी
नज़्म
तुम ज़रूर जाना उन के दिलों को टटोलने के लिए
कि इस से अच्छा मौक़ा उन को परखने का और नहीं मिलेगा
शाइस्ता हबीब
नज़्म
बिन ज़ाहिर किए तमाम एहसासात जो परख लेती थी
मेरे लिए जो हर कहानी हर एक क़िस्से में थी
आमिर रियाज़
नज़्म
न देखे हैं बुरे इस ने न परखे हैं भले इस ने
शिकंजों में जकड़ कर घूँट डाले हैं गले इस ने
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जो ऊपर ऊँचा बोल करे तो उस का बोल भी बाला है
और दे पटके तो उस को भी कोई और पटकने वाला है