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नज़्म
जब भी महताब-ए-ज़र-अफ़्शाँ के हो चेहरे पे नक़ाब
जान हम रख के हथेली पर उलट देते हैं
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
बनाया आँचलों से परचम-ए-फ़त्ह-ओ-ज़फ़र तुम ने
लुटाए मख़्ज़न-ए-ता'लीम से लाल-ओ-गुहर तुम ने
मलिका नसीम
नज़्म
खुल चुका जब परचम-ए-ग़म ज़िंदगी के क़स्र पर
अब हवाओं ने कमर पौदों की लचकाई तो क्या
जोश मलीहाबादी
नज़्म
रफ़ीक़ संदेलवी
नज़्म
क़ल्ब मेरा दौलत-ए-एहसास खो सकता नहीं
आब-ओ-ताब-ए-ज़र में ख़ुद्दारी डुबो सकता नहीं
नख़्शब जार्चवि
नज़्म
कहीं ये ख़ूँ से फ़र्द-ए-माल-ओ-ज़र तहरीर करती है
कहीं ये हड्डियाँ चुन कर महल ता'मीर करती है