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नज़्म
ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों की मक़्तल-गाहें
जिन के परतव से चराग़ाँ हैं हज़ारों के दिमाग़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जबीं पर साया-गुस्तर परतव-ए-क़िंदील-ए-रहबानी
अज़ार-ए-नर्म-ओ-नाज़ुक पर शफ़क़ की रंग-अफ़्शानी
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
लिए हैं कर में मंगल-घट न क्यूँ घट घट पे छा जाएँ
अगर परतव पड़े मुर्दा-दिलों पर वो भी जी जाएँ
नज़ीर बनारसी
नज़्म
मेहराब है रुख़्सार के परतव से ज़र-अफ़्शाँ
ज़ुल्फ़ों में शब-ए-तार है आँखों में चराग़ाँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ये इंसान की बरतरी के नए दौर के शादयाने हैं सुन लो
यही है नए दौर का परतव-ए-अव्वलीं भी