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नज़्म
इन में सच्चे मोती भी हैं, इन में कंकर पत्थर भी
इन में उथले पानी भी हैं, इन में गहरे सागर भी
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ले के इक चंगेज़ के हाथों से ख़ंजर तोड़ दूँ
ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
कितना अर्सा लगा ना-उमीदी के पर्बत से पत्थर हटाते हुए
एक बिफरी हुई लहर को राम करते हुए
तहज़ीब हाफ़ी
नज़्म
रौशनियों की पीली किर्चें पूरब पच्छिम फैल गईं
तू ने किस शय के धोके में पत्थर पर दे पटका चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
झूटी सच्ची बातों के बाज़ार सजाते गुज़री है
पत्थर की दीवारों को संगीत सुनाते गुज़री है