aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "phandaa"
किस ज़बाँ से कह रहे हो आज तुम सौदागरोदहर में इंसानियत के नाम को ऊँचा करोजिस को सब कहते हैं हिटलर भेड़िया है भेड़ियाभेड़िये को मार दो गोली पए-अम्न-ओ-बक़ाबाग़-ए-इंसानी में चलने ही पे है बाद-ए-ख़िज़ाँआदमिय्यत ले रही है हिचकियों पर हिचकियाँहाथ है हिटलर का रख़्श-ए-ख़ुद-सरी की बाग परतेग़ का पानी छिड़क दो जर्मनी की आग परसख़्त हैराँ हूँ कि महफ़िल में तुम्हारी और ये ज़िक्रनौ-ए-इंसानी के मुस्तक़बिल की अब करते हो फ़िक्रजब यहाँ आए थे तुम सौदागरी के वास्तेनौ-इंसानी के मुस्तक़बिल से किया वाक़िफ़ न थेहिन्दियों के जिस्म में क्या रूह-ए-आज़ादी न थीसच बताओ क्या वो इंसानों की आबादी न थीअपने ज़ुल्म-ए-बे-निहायत का फ़साना याद हैकंपनी का फिर वो दौर-ए-मुजरिमाना याद हैलूटते फिरते थे जब तुम कारवाँ-दर-कारवाँसर-बरहना फिर रही थी दौलत-ए-हिन्दोस्ताँदस्त-कारों के अंगूठे काटते फिरते थे तुमसर्द लाशों से गढों को पाटते फिरते थे तुमसनअत-ए-हिन्दोस्ताँ पर मौत थी छाई हुईमौत भी कैसी तुम्हारे हात की लाई हुईअल्लाह अल्लाह किस क़दर इंसाफ़ के तालिब हो आजमीर-जाफ़र की क़सम क्या दुश्मन-ए-हक़ था 'सिराज'क्या अवध की बेगमों का भी सताना याद हैयाद है झाँसी की रानी का ज़माना याद हैहिजरत-ए-सुल्तान-ए-देहली का समाँ भी याद हैशेर-दिल 'टीपू' की ख़ूनीं दास्ताँ भी याद हैतीसरे फ़ाक़े में इक गिरते हुए को थामनेकस के तुम लाए थे सर शाह-ए-ज़फ़र के सामनेयाद तो होगी वो मटिया-बुर्ज की भी दास्ताँअब भी जिस की ख़ाक से उठता है रह रह कर धुआँतुम ने क़ैसर-बाग़ को देखा तो होगा बारहाआज भी आती है जिस से हाए 'अख़्तर' की सदासच कहो क्या हाफ़िज़े में है वो ज़ुल्म-ए-बे-पनाहआज तक रंगून में इक क़ब्र है जिस की गवाहज़ेहन में होगा ये ताज़ा हिन्दियों का दाग़ भीयाद तो होगा तुम्हें जलियानवाला-बाग़ भीपूछ लो इस से तुम्हारा नाम क्यूँ ताबिंदा है'डायर'-ए-गुर्ग-ए-दहन-आलूद अब भी ज़िंदा हैवो 'भगत-सिंह' अब भी जिस के ग़म में दिल नाशाद हैउस की गर्दन में जो डाला था वो फंदा याद हैअहल-ए-आज़ादी रहा करते थे किस हंजार सेपूछ लो ये क़ैद-ख़ानों के दर-ओ-दीवार सेअब भी है महफ़ूज़ जिस पर तनतना सरकार काआज भी गूँजी हुई है जिन में कोड़ों की सदाआज कश्ती अम्न के अमवाज पर खेते हो क्यूँसख़्त हैराँ हूँ कि अब तुम दर्स-ए-हक़ देते हो क्यूँअहल-ए-क़ुव्वत दाम-ए-हक़ में तो कभी आते नहीं''बैंकी'' अख़्लाक़ को ख़तरे में भी लाते नहींलेकिन आज अख़्लाक़ की तल्क़ीन फ़रमाते हो तुमहो न हो अपने में अब क़ुव्वत नहीं पाते हो तुमअहल-ए-हक़ रोशन-नज़र हैं अहल-ए-बातिन कोर हैंये तो हैं अक़वाल उन क़ौमों के जो कमज़ोर हैंआज शायद मंज़िल-ए-क़ुव्वत में तुम रहते नहींजिस की लाठी उस की भैंस अब किस लिए कहते नहींक्या कहा इंसाफ़ है इंसाँ का फ़र्ज़-ए-अव्वलींक्या फ़साद-ओ-ज़ुल्म का अब तुम में कस बाक़ी नहींदेर से बैठे हो नख़्ल-ए-रास्ती की छाँव मेंक्या ख़ुदा-ना-कर्दा कुछ मोच आ गई है पाँव मेंगूँज टापों की न आबादी न वीराने में हैख़ैर तो है अस्प-ए-ताज़ी क्या शिफ़ा-ख़ाने में हैआज कल तो हर नज़र में रहम का अंदाज़ हैकुछ तबीअत क्या नसीब-ए-दुश्मनाँ ना-साज़ हैसाँस क्या उखड़ी कि हक़ के नाम पर मरने लगेनौ-ए-इंसाँ की हवा-ख़्वाही का दम भरने लगेज़ुल्म भूले रागनी इंसाफ़ की गाने लगेलग गई है आग क्या घर में कि चिल्लाने लगेमुजरिमों के वास्ते ज़ेबा नहीं ये शोर-ओ-शैनकल 'यज़ीद' ओ 'शिम्र' थे और आज बनते हो 'हुसैन'ख़ैर ऐ सौदागरो अब है तो बस इस बात मेंवक़्त के फ़रमान के आगे झुका दो गर्दनेंइक कहानी वक़्त लिक्खेगा नए मज़मून कीजिस की सुर्ख़ी को ज़रूरत है तुम्हारे ख़ून कीवक़्त का फ़रमान अपना रुख़ बदल सकता नहींमौत टल सकती है अब फ़रमान टल सकता नहीं
उन की शाख़ों से ख़्वाबों के सब नग़्मा-गरजिन की आवाज़ गर्दन का फंदा बनीअपने नग़्मों से जब नाशना हो गएआप ही आप सब ख़ाक में आ गिरेऔर सय्याद ने गुमाँ भी न कीऐ ख़ुदा-ए-बहाराँ ज़रा रहम करउन की मुर्दा रगों को नुमू बख़्श देउन के तिश्ना दिलों को लहू बख़्श देकोई इक पेड़ फिर लहलहाने लगेकोई इक नग़्मा-गर चहचहाने लगे
सोचता हूँवक़्त की गर्दन पकड़ कररेशमी स्कार्फ़ का फंदा लगा करखींच लूँऔर इतनी ज़ोर से चीख़ूँज़मीं सेआसमाँ तकसिर्फ़ मेरी चीख़ ही का शोर गूँजेवक़्त की मरती हुई आवाज़ कोई सुन न पाए
मेरी हर ख़्वाहिश पे तो कहती है हो कर ख़शमगींअच्छे शौहर इस तरह की ज़िद किया करते नहींतो जो टीवी मुझ को ला देती मिरी रौशन-जबींमैं कोई पागल हूँ फिर भी शाम को जाऊँ कहींमुझ को हर फंदा गवारा है ये दाना भी तो होघर में रहने के लिए कोई बहाना भी तो हो
मैं इक मासूम शहरी थाशराफ़त से सभी के साथ रहता थामोहज़्ज़ब तौर से जीता थासब के काम आता थाकभी मैं ने किसी का दिल नहीं तोड़ाकिसी का सर नहीं फोड़ाकिसी तरकश से कोई तीर क्या तिनका नहीं छोड़ाकिसी की पीठ में ख़ंजर नहीं भोंकाकिसी के जिस्म पर बारूद का गोला नहीं फेंकाकिसी को आग में मैं ने नहीं झोंकाकिसी का हक़ नहीं माराकिसी का ज़र नहीं लूटाकोई ख़िर्मन नहीं फूँकाकिसी बिल्डिंग किसी गाड़ी किसी महफ़िल में कोई बम नहीं रक्खामिरे हाथों किसी का घर नहीं उजड़ाकिसी का दर नहीं उखड़ाकोई कुम्बा नहीं बिखराकोई माथा नहीं सिकुड़ाकिसी की राह में रोड़ा नहीं अटकाकिसी के काम में मैं ने कभी रख़्ना नहीं डालाकिसी के वास्ते दिल में कभी कीना नहीं पालाकोई फ़रमान हाकिम का कभी मैं ने नहीं टालाकोई घेरा नहीं लाँघाकोई आँगन नहीं फाँदामगर फिर भी क़यामत मुझ पे टूटी हैअजब ग़ारत-गरी का क़हर बरसा हैअजब सफ़्फ़ाक ख़ंजर दिल में उतरा हैकि मेरी रूह अब तक तिलमिलाती हैकि मेरा ज़ेहन अब भी झुनझुनाता हैकि मेरी साँस अब भी लड़खड़ाती हैसमझ में कुछ नहीं आताकि मैं ने क्या बिगाड़ा हैमिरे किस जुर्म की मुझ को मिली हैये सज़ा आख़िरये गुत्थी किस तरह खोलूँसबब किस से यहाँ पूछूँकिधर जाऊँकिसे रोकूँसभी चेहरे यहाँ पत्थरसभी आँखें यहाँ पत्थरबसारत में भरा पत्थरसमाअत में बसा पत्थरज़बानों में गड़ा पत्थरअदालत में खड़ा पत्थरहर इक क़ानून में पत्थरहर इक आईन में पत्थरहर इक इंसाफ़ में पत्थरहर इक आवाज़ में पत्थरहर इक एहसास में पत्थरये पत्थर युग के पत्थर से भी भारी हैनगीने की तरह तरशा हुआ हैऔर हीरे की अनी की तरह उस की तेज़ नोकें हैंबहुत शफ़्फ़ाफ़ है ये और इस में इक तमद्दुन हैमैं इस पत्थर से सर फोड़ूँकि अपनी ज़िंदगी छोड़ूँकि अपना रास्ता मोड़ूँकि बन जाऊँ मैं ख़ुद पत्थरसमझ में कुछ नहीं आता
काँटों की चट्टान पे खड़ीमैं आँखों की सूइयाँ निकाल रही हूँये इलाक़ा किस सल्तनत में शामिल हैमुलूकियत मेरी ज़बान पे काँटेहल्क़ में फंदाआँखें बाहरशाह-बलूत के लम्बे दरख़्तों जैसेलम्बे पूत बहुत हो गए हैंजंगल में दरख़्त ज़ियादा हो जाएँतो आग लगा कर दरख़्त कम कर दिए जाते हैंबाहर निकली हुई आँख से ज़ाफ़रान का खेतऔर कटे हुए बाज़ुओं से गन्ने की पोरियाँ बन गई हैंहम ने एक झूट बोला था नाअब सारी उम्र उस को सच साबित करने में गुज़ार देंगेहम कि जो ज़िंदगी भरअपने हिस्से की रोटी कमाने की कोशिश करते हैंऔर भूके रहते हैंझूटी आस की छतरी तलेबुलबुले जैसे आँसूबताशों की तरह थाल में सजाएकब तक बतलाती रहोगीकि वो तुम्हारा क़ातिल नहीं हैक़त्ल महज़ सानिए मेंज़िंदगी का रिश्ता ख़त्म करने का नाम नहींमौजूद से इंकार भीतो क़त्ल के मुतरादिफ़ होता हैमेरा जी करता हैवो जो सब मेरे क़ातिल हैंमैं उन्हें हवा की तरह निगल जाऊँ
हाँ ऐ मसाफ़-ए-हस्ती! मत पूछ मुझ से क्या हूँइक अर्सा-ए-बला हूँ इक लुक़मा-ए-फ़ना हूँमजबूरियों ने डाला गर्दन में मेरी फंदाख़ुद-कर्दा-ए-वफ़ा हूँ जाँ-दादा-ए-रज़ा हूँसय्याद हादसे का करता है मेरा पीछामुर्ग़-ए-बुरीदा-पर हूँ सैद-ए-शिकस्ता-पा हूँहै ज़ात मेरी मजमा' सारी बुराइयों काकहने को मैं बड़ा हूँ लेकिन बहुत बुरा हूँआज़ादियों की मुझ पर तोहमत ही है सरासरमैं क़ैदी-ए-हवस हूँ मैं बंदा-ए-हवा हूँइक बात हो बताऊँ इक दर्द हो सुनाऊँरोऊँ भला कहाँ तक कब तक पड़ा कराहूँकम-बख़्त दिल कुछ ऐसा मैं साथ ले के आयाइक लम्हा जिस के हाथों दुनिया में सुख न पायाजो जोश इस में उट्ठा हालात ने दबायाजो शो'ला इस में भड़का तक़दीर ने बुझायाउम्मीद का ये ग़ुंचा खिलते कभी न देखाये आरज़ू का पौदा फलता नज़र न आयागो इस में मौजज़न थी क़ौम ओ वतन की उल्फ़तलेकिन ग़रज़ ने इस को कुछ और ही सिखायाहोती नहीं रसाई उम्मीद के उफ़ुक़ तकतूल-ए-अमल ने इस को इक जाल में फँसायाकी रहबरी ख़िरद ने हर-चंद रहनुमाईइस जुहद पर भी लेकिन खुलती नहीं सच्चाईपाया न मैं ने अब तक मक़्सद का अपने साहिलकी बहर-ए-मा'रफ़त में दिन रात आश्नाईइस जुस्तुजू में मैं ने की सैर-ए-तूर-ओ-ऐमनपर्बत को घर बनाया जंगल से लौ लगाईमंदिर को जा के देखा गिरजा में जा के ढूँडामस्जिद को छान मारा उस की न दीद पाईजोगी का रूप धारा बन में किया गुज़ारातन पर भभूत मल कर धूनी बहुत रमाईजप तप में उम्र अपनी मैं ने बसर की अक्सरबन बन के पीर-ए-राहिब जा ख़ानक़ाह बसाईसूफ़ी भी बन के देखा और रिंद-ए-बे-रिया भीकर नारा-ए-अना-अल-हक़ इक खलबली मचाईफिरती हैं मारी मारी मुश्ताक़-ए-जल्वा आँखेंपर इक झलक से बढ़ कर देता नहीं दिखाईउठ जा नज़र से मेरी हाँ ऐ हिजाब-ए-हस्तीहुस्न-ए-अज़ल निहाँ है ज़ेर-ए-नक़ाब-ए-हस्तीये ज़िंदगी-ए-इंसाँ इक ख़्वाब है परेशाँबेदारी-ए-अदम है ता'बीर-ए-ख़्वाब-ए-हस्तीदेखें अगर तो क्यूँ-कर हम जलवा-ए-मआरिफ़तू ज़ुल्मत-ए-नज़र है ऐ आफ़्ताब-ए-हस्तीतस्कीं को ज़हर-ए-क़ातिल आब-ओ-हवा-ए-आलमराहत का दुश्मन-ए-जाँ हर इंक़लाब-ए-हस्तीऐ तिश्ना-ए-हक़ीक़त धोके में तू न आनाइक दाम-ए-पुर-ख़तर है मौज-ए-सराब-ए-हस्तीचाहे अगर रिहाई पेश-अज़-फ़ना फ़ना होपादाश-ए-जुर्म-ए-हस्ती है ये अज़ाब-ए-हस्ती
एक ऐसे सर्वे के मुताबिक़जो मेरे दोस्तअपने दिल को मौसूल होने वालीग़ैर-ज़रूरी ख़बरों को जम्अ कर केमुरत्तब कर रहे हैंशहर में कोई ख़ुद-कुशी नहीं कर रहामोहब्बत में नाकामी पर फ़ीनाइल पीने वाली लड़कियाँऔर नौकरी न मिलने परबड़े भाई के लाइसेंस-याफ़ता पिस्तौल सेख़ुद-कुशी करने वाले लड़केबहुत दिन से नज़र नहीं आएदुपट्टे का फंदा बना कर मर जाने वालीबे-औलाद दुल्हनेंऔर तवील बीमारी से तंग आ करख़ुद को जला कर हलाक करने वालेउधेड़-उम्र मरीज़नापैद हो गए हैंशहर में अब जिस को भी ख़ुद-कुशी करनी होउसे बहुत ज़ियादा तग-ओ-दौ नहीं करनी पड़तीवो बाहर निकलता हैऔर थोड़ी देर के लिएनिशाना-बाज़ों वाली येलो कैब काइंतिज़ार करता हैया जब उस की सड़क के दोनों तरफ़ख़ूब फायरिंग हो रही होवो बिला-इरादा बॉलकनी में जा के खड़ा हो जाता हैजब लोग ख़ुद-कुशी करना चाहते हैंयक़ीन कीजिएकिसी जिंसी इम्तियाज़ के बग़ैररंग, नस्ल और ज़बान के फ़र्क़ को ख़ातिर में न लाते हुएगोलियाँ हर जगहउन्हें ढूँढ निकालती हैं
चंद साल उस तरफ़हम शनासा निगाहों से बचते-बचातेयहीं पर मिले थेतुम्हें याद हैकाएनात एक टेबल के चारों तरफ़ घूमती थीहमें देख कर कितने बूढ़ों की आँखेंकिसी याद-ए-रफ़्ता में नम हो रही थीमगर मैं ने आँखों मेंअपने लिए और तुम्हारे लिएमछलियों की तरह तैरते आँसुओं में तमन्नाएँ देखींमुझे याद हैजब किसी अजनबी मेहरबाँ ने हमें फूल भेजेतो तुम कितनी नर्वस हुईंजल्द ही ख़ौफ़, ख़दशे हवा हो गएदूसरी टेबलों पर भी गुल-दस्ते हँसने लगेअब मोहब्बत का मस्कन कहीं और हैये जगह अब ज़बाँ-बंद दुश्मन का मुँह खोलने के लिए हैजहाँ अपनी टेबल थी अब उस जगह एक फंदा लगा हैकहाँ आ गई हो मोहब्बत का कतबा उठाए हुएआओ आगे चलें
असनाम-ए-इमारत का परस्तार है आलमसरमाया-ए-ग़फ़लत का ख़रीदार है आलमकटती हैं सदा सिद्क़ मक़ालों की ज़बानेंहक़-गो के लिए अर्सा-गह-ए-दार है आलमदरवेश-ए-ख़ुदा नान-ए-शबीना को है मुहताजगो ने'मत-ओ-इकराम का बाज़ार है आलमशादाब है दिन-रात ग़रीबों के लहू सेअरबाब-ए-ज़र-ओ-सीम का गुलज़ार है आलमख़ुद ज़ाहिद-ए-सद-साला गिरफ़्तार है जिस मेंवो हल्क़ा-ए-तज़वीर-ओ-फ़ुसूँ-ज़ार है आलमहर गाम पे है शो'बदा-ए-नफ़्स का फंदारक़्क़ासा-ए-औहाम का दरबार है आलमदिल ख़िज़्र का है नग़मा-ए-बे-मानी पे रक़्साँतहज़ीब के पाज़ेब का झंकार है आलमइस क़हबा-ए-बाज़ारी से रखो न तवक़्क़ो'एहसान फ़रामोश-ओ-ज़ियाँ-कार है आलमसर रखता है आवारा-मिज़ाजों के क़दम परये हक़ में वफ़ादारों के तलवार है आलमशाइर के नहीं सीने में गुंजाइश-ए-तकियामाना कि बहुत दिलकश-ओ-पुरकार है आलमइस अहद-ए-पुर-आशोब में 'बेबाक' न पूछोकिस दर्जा जफ़ा-कश-ओ-सितम-गार है आलम
दरवाज़े पे खट से हुई इक आवाज़और मैं चौंक गईज़रूर होगा आज का अख़बारदरवाज़ा खोल कर देखामेरा अंदाज़ा सही नहीं थावहाँ अख़बार पड़ा नहीं थावहाँ था आग का एक गोलाउस में लिपटी थींचंद मसली हुई मासूम कलियाँकुछ गंदी तंग गलियाँभूक का सोज़और कुछ ज़ख़ीरा-अंदोज़बे-रोज़-गारी का सन्नाटाग़ुर्बत का चाँटासूखा और बाज़ार मंदासाथ में ख़ुद-कुशी का था फंदासरहदों के झगड़ेजंगऔर एक ख़तरा एटम-बमकितने जंगलघटती हरियालीबीमारीअस्पतालों की बद-हालीघोटालों का शोरऔर रिश्वत-ख़ोरी की होड़ज़ुल्म-ओ-सितम की दास्तानेंधमाकों की आवाज़ेंदिमाग़ घूम गयाफिर ग़ौर से देखाअरे नहींवो आज का अख़बार ही थालरज़ते काँपते हाथों से उठा लियाउठाना तो था ही ना
जी में है कि जल-थल बरसूँपर ये आँसू किस किस नाम से रोऊँगीइक आँसू पर नाम है उस काजिस के हाथ सवाली हैंइक आँसू है उस के नामजो सर्दी में कोहर-ज़दा उन सड़कों पर भूखों मरता हैये लम्बी काली कारों में कौन सी दुनिया बैठती हैक्या नाम है उन का कौन हैं वोक्या बेचते हैंऔर सुर्ख़ गुलाबी होंटों पर ये गीत हैं क्योंपर टाट के पीछे हैराँ हैराँ ज़र्द से चेहरेआँखों में सपनों के रौज़नसपने मीठी रोटी केहर रात को छुप कर आते हैंऔर दिन कोघर घर घी से लिथड़े चीनी के बर्तन को धोने की ख़ातिरकौन भला अब पानी गर्म करेराख उजड़े सपनों कीऔर नमकीन गर्म पानी इन आँखों काबेगम साहिबा की घर कीऔर साहब की लाड भरी आँखेंलोगोउन से कब सिन्दूर भरी मांगों और छन-छन करती रंग-बिरंगीचूड़ियों को फिर जी भर के देखा है कभीये लो पानी बरस रहा हैपानी खारा मीठा और कसीला पानीधुआँ बन कर गले में अटक रहा हैथोड़ा खाँस ही लोये चाहत ही फंदा बन कर आँसू के रस्ते से निकलेहर आँसू किस किस नाम केइस के उस केअपने तुम्हारे कल के आज के या फिर आने वाली कल केजो साफ़ सलेट की मानिंद गुम-सुम हैऔर मैं सारे समुंदर आँसू पी कर प्यासी ही रह जाती हूँ
यहाँ न कोई दरख़्त होगान फूल पत्ते न घास शबनमन चाँद रातों को अपना चेहरा दिखा सकेगान दिन को सूरजहवा सलाख़ों से सर पटख़ करगले में फंदा लिए यूँही दर-ब-दर फिरेगीये मेरी धरती यूँही रहेगीख़िज़ाँ हवाओं ने उस की शादाबियों के मंज़र उजाड़ने कोवो गुल खिलाएक़ज़ा भी क़िस्तों में आ रही हैमिरा वतन एक बूढे बरगद की शाख़-ए-नाज़ुक बना हुआ हैमिरी दुआ हैकि मैं भी कर्ब-ओ-बला से गुज़रूँकि ऐसे शादाब मंज़रों का उजाड़-पनमैं न देख पाऊँ
धड़कनें मचलती हैं सीने मेंसाँसों को पहरे पे बिठा रखा हैहिचकियाँ न जाने कब दस्तक दे देंख़्वाहिशों का फंदा गले से निकलता ही नहीं
उस ने पहचान के आवाज़ दीमैं भी हूँ तिरे साथ मगरपड़ गया हल्क़ में तेज़ाबी धुएँ का फंदाक़हक़हा लोहे का गूँज उठा सभी साथी पुकारे वो गयासायरन चीख़ के बोला कि दीवाना था कोई
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
नहीं हो तुम मिरे और मेरा फ़र्दा भी नहीं मेरासो मैं ने साहत-ए-दीरोज़ में डाला है अब डेरामिरे दीरोज़ में ज़हर-ए-हलाहल तेग़-ए-क़ातिल हैमिरे घर का वही सरनाम-तर है जो भी बिस्मिल हैगुज़श्त-ए-वक़्त से पैमान है अपना अजब सा कुछसो इक मामूल है इमरान के घर का अजब सा कुछ
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
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