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नज़्म
वो 'भगत-सिंह' अब भी जिस के ग़म में दिल नाशाद है
उस की गर्दन में जो डाला था वो फंदा याद है
जोश मलीहाबादी
नज़्म
हाँ ऐ मसाफ़-ए-हस्ती! मत पूछ मुझ से क्या हूँ
इक अर्सा-ए-बला हूँ इक लुक़मा-ए-फ़ना हूँ
ग़ुलाम भीक नैरंग
नज़्म
ये जगह अब ज़बाँ-बंद दुश्मन का मुँह खोलने के लिए है
जहाँ अपनी टेबल थी अब उस जगह एक फंदा लगा है
ताबिश कमाल
नज़्म
पड़ गया हल्क़ में तेज़ाबी धुएँ का फंदा
क़हक़हा लोहे का गूँज उठा सभी साथी पुकारे वो गया
बशर नवाज़
नज़्म
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ
फ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नहीं हो तुम मिरे और मेरा फ़र्दा भी नहीं मेरा
सो मैं ने साहत-ए-दीरोज़ में डाला है अब डेरा