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नज़्म
इसी की आरज़ूओं की लहद में फेंक आया हूँ
मैं उस लड़के से कहता हूँ वो शोला मर चुका जिस ने
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
नए उनवान से ज़ीनत दिखाएँगे हसीं अपनी
न ऐसा पेच ज़ुल्फ़ों में न गेसू में ये ख़म होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
शब्नमिस्तान-ए-तजल्ली का फ़ुसूँ क्या कहिए
चाँद ने फेंक दिया रख़्त-ए-सफ़र आज की रात
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मिरी जाँ अब भी अपना हुस्न वापस फेर दे मुझ को
अभी तक दिल में तेरे इश्क़ की क़िंदील रौशन है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सिमट कर किस लिए नुक़्ता नहीं बनती ज़मीं कह दो
ये कैसा फेर है तक़दीर का ये फेर तो शायद नहीं लेकिन
मीराजी
नज़्म
ख़ुर्दनी चीज़ों के चेहरों से टपकता है लहू
रूपये का रंग फ़क़ है अशरफ़ी है ज़र्द-रू