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नज़्म
बढ़ के उस इन्दर सभा का साज़ ओ सामाँ फूँक दूँ
उस का गुलशन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
इसी की आरज़ूओं की लहद में फेंक आया हूँ
मैं उस लड़के से कहता हूँ वो शोला मर चुका जिस ने
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
वो इक मिज़राब है और छेड़ सकती है रग-ए-जाँ को
वो चिंगारी है लेकिन फूँक सकती है गुलिस्ताँ को
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मैं ख़ुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज को
तुम ही नहीं तो आग लगा दूँगी राज को
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
कलेजा फुंक रहा है और ज़बाँ कहने से आरी है
बताऊँ क्या तुम्हें क्या चीज़ ये सरमाया-दारी है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मेरी रूह की ज्वाला मुझ को फूँक रही है धीरे धीरे
मेरी आग भड़क उट्ठी है कोई बुझाओ कोई बुझाओ
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
चराग़ साँसों ने फूँक डाला
हवा से कैसी शिकायतें हों जो घर में ठहरें तो ख़ौफ़ आए