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नज़्म
अपने ही दिल का पियाला पिए मदहोश हूँ मैं
झूटी पीता नहीं मग़रिब की वो मय-नोश हूँ मैं
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
चाँटे न जमाए जाएँगे डंडों से न पीटा जाएगा
उस्ताद के मौला-बख़्श जहाँ दिखला न सकेंगे कुछ कर्तब
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
कभी पतझड़ का मौसम ख़ून पीता है दरख़्तों का
कभी सूखी हुई शाख़ों पे कलियाँ खिलखिलाती हैं