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नज़्म
पीते हैं मय के प्याले और देखते हैं जंगले
कितने फिरे हैं बाहर ख़ूबाँ को अपने संग ले
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
कौन मरहम ज़ख़्म-ए-जाँ पर प्यार से रख पाएगा
दर्द की शिद्दत में मेरी पीठ को सहलाएगा
शहनाज़ परवीन शाज़ी
नज़्म
पीठ पर नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त इक बार-ए-गराँ
ज़ोफ़ से लर्ज़ी हुई सारे बदन की झुर्रियाँ
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
पीठ पीछे सब को देता हूँ मुग़ल्लज़ गालियाँ
सामने लेकिन अदब से सर के बल जाता हूँ मैं
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
तंग-नज़री बुग़्ज़ और नफ़रत-भरे त्रिशूल को
पीठ में इंसानियत की इस तरह घोंपा गया
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
नज़्म
घोड़ा बन कर कौन चलेगा पीठ पे कौन बिठाएगा
घोड़ा बनना क्या मुश्किल है हम ख़ुद ही बन जाएँगे