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नज़्म
इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
पतझड़ के पेड़ों में अटका पीला सा इक पत्ता चाँद
दुख का दरिया सुख का सागर इस के दम से देख लिए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
शराब आँखों से ढल रही है, नज़र से मस्ती उबल रही है
छलक रही है उछल रही है, पिए हुए हैं पिला रहे हैं
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
लो वो चाह-ए-शब से निकला पिछले-पहर पीला महताब
ज़ेहन ने खोली रुकते रुकते माज़ी की पारीना किताब
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
भड़कते सीनों में बस रही हैं क़रार बन कर तिरी अदाएँ
तरसती रूहों को जाम-ए-इशरत पिला रही हैं तिरी वफ़ाएँ
मजीद अमजद
नज़्म
तौर-तरीक़ा उखड़ा-उखड़ा चेहरा पीला सख़्त मलूल
राह में जैसे ख़ाक पे कोई मसला मसला बाग़ का फूल