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नज़्म
उम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैं
इज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हुवैदा आज अपने ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ कर के छोड़ूँगा
लहू रो रो के महफ़िल को गुलिस्ताँ कर के छोड़ूँगा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
किस किस के न जाने बुत-ए-पिंदार को ढाया
जब ईद का दिन आया तो फिर दिल को सजाया