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नज़्म
इक सूरज है जो शाम-ढले मुझे पुरसा देने आता है
उन फूलों का जो मेरे लहू में खिलने थे और खिले नहीं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
दल के दल बादल जब तेरा पुर्सा दे के चले जाते
दूर कहीं इक अब्र का टुकड़ा जैसे मुझ को रोता था
शहाब जाफ़री
नज़्म
आज मिल जाएगा शायद यहाँ अश्कों का सिला
हदिया-ए-अश्क मैं लाया हूँ ब-नाम-ए-पुर्सा