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नज़्म
दरिया में शेर ख़ाक उड़ाता था नाव पर
बिस्मिल दो-ज़ानू बैठा था पुश्त-ए-बिलाव पर
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
हर एक मक़्तल में दफ़्न शो'लों की राख लाना
हर एक पुश्त-ए-बशर पे तहरीर वहशतों की लकीर लाना
हसन हमीदी
नज़्म
और फिर धुँदली फ़ज़ाओं में तू खो जाती है
देखता हूँ जो मैं मुड़ कर कि पस-ए-पुश्त है कौन