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नज़्म
इसी रविश पे है क़ाइम मिज़ाज-ए-दीदा-ओ-दिल
लहू में अब भी तड़पती हैं बिजलियाँ कि नहीं
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरें हैं
फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं