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नज़्म
वो हाकिम क़ादिर-ए-मुतलक़ है यकता और दाना है
अँधेरे को उजाले से जुदा करता है ख़ुद को मैं
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
जिसे दबाने के ब'अद उस को ग़द्र कहने लगे
ये अहल-ए-हिन्द भी होते हैं किस क़दर मासूम
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
मैं ख़ुदा-ए-क़ादिर-ए-मुतलक़ रहीम-ओ-अकरम से
जुनून-ए-मज़हबी के ख़ात्मे और अम्न की फ़ज़ा माँगूँगा
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
ये अक़ीदा हिंदुओं का है निहायत ही क़दीम
जब कभी मज़हब की हालत होती है ज़ार-ओ-सक़ीम