aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "qaafiyaa"
तो मैं क्या कह रहा था यानी क्या कुछ सह रहा था मैंअमाँ हाँ मेज़ पर या मेज़ पर से बह रहा था मैंरुको मैं बे-सर-ओ-पा अपने सर से भाग निकला हूँइला या अय्युहल-अबजद ज़रा यानी ज़रा ठहरोThere is an absurd I इन absurdity शायदकहीं अपने सिवा यानी कहीं अपने सिवा ठहरोतुम इस absurdity में इक रदीफ़ इक क़ाफ़िया ठहरो
शाइरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़लउर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटलनज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भीये कभी नस्र है और मुअर्रा कभीनज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँऔर आज़ाद में भी है इस का निशाँनज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र हैवज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर हैवज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुएनसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगेवज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तोइस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहोमसनवी हो क़सीदा हो या मर्सियानज़्म का मिलता है बच्चो हम को पतानज़्म में सिलसिला है ख़यालात काएक दरिया सा है देखो जज़्बात कावो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोईये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद कीवो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनोदोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगहहैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशहनज़्म में जो कहानी कही जाएगीशौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगीनज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखींजो निहायत ही मशहूर साबित हुईंकरता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआनज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा
हँसी कल से मुझे इस बात पर है आ रही ख़ालूकि ख़ाला कह रही थीं आप का है क़ाफ़िया आलूउसी दिन से बहुत डरने लगा हूँ आप से ख़ालाजब अम्मी ने बताया आप का है क़ाफ़िया भालाअगर पूछे कोई क्या क़ाफ़िया है आप का फु्प्पीतो फ़ौरन सामने रख दूँगा ला कर तेल की कुप्पीअगर शाइ'र कहें बे-क़ाफ़िया है लफ़्ज़-ए-बहनोईमिरे बहनोई सर पर शाइ'रों के मारना डोईअगर पूछे कोई क्या क़ाफ़िया है आप का दादीतो मलमल फेंक देना ओढ़ लेना सर पे तुम खादीबहुत है घूमने का शौक़ तुम को ऐ बड़े भय्यान मारो तो बता दूँ है तुम्हारा क़ाफ़िया पहियातुम अपना क़ाफ़िया ख़ुद बन गई हो ऐ मेरी आपानज़र लग जाएगी तुम सर पे रख कर हो हो टापातुम्हारा क़ाफ़िया कोई नहीं है ऐ नहीफ़ अम्मीयही अच्छा है तुम चुपके से बन जाओ रदीफ़ अम्मी
क़ाफ़ियों से कोई छुटकारा दिलाएबन गई तकलीफ़-ए-जाँ मुझ को रदीफ़बहर है हर वक़्त दिल में मौजज़न(क़ाफ़िए की आज़माइश से गुज़रक़ाफ़िया-पैमा न बनक़ाफ़िए ने आ दबोचा क़ाफ़िया-पैमा न हो)खुरदुरे-पन को तरसती है ज़बाँक्यूँ मंझी हैं इस क़दर नज़्में मिरीक्यूँ सजी है इस क़दर मेरी ग़ज़ल(क़ाफ़िए को रोक फिर आने लगा)ज़ेहन है मजनून-ए-आदाब-ए-सुख़नदिल पुराने रस का रसिया है अभीनिकहत-ए-माज़ी का बसिया है अभी(क़ाफ़िया फिर आ गया मजबूर हूँक़ाफ़िए को रोक फिर आने लगा)सोचता हूँ बहर की मौजों में जकड़ा हूँ अभीक़ाफ़िया तो ख़ैर काफ़ी रुक गयाबहर तो टूटी नहींबहर इक बहर-ए-बसीतबहर इक देव-ए-तनोमंद-ओ-मुहीतइस क़दर जिद्दत से क्यूँ है कद मुझेज़ेहन ओ दिल हैं क्यूँ रिवायत के असीर
तौसन-ए-तब-ए-रसा के पाँव में कुछ लंग हैलेकिन इस सूरत में चुप रहना भी वज्ह-ए-नंग हैशेर का सामान है कमयाब दौर-ए-जंग हैशाएरी भी फ़र्ज़ है और क़ाफ़िया भी तंग हैक़ाफ़िए और वज़्न की बंदिश से हो कर तल्ख़-कामऐ समंद-ए-तब्अ तुझ को कर रहा हूँ बे-लगाम
दुनिया-ए-रंग-ओ-बू से मोहब्बत नहीं रहीअब गुल-रुख़ान-ए-दहर की चाहत नहीं रहीया-रब ये किस मक़ाम पर अब आ गया हूँ मैंबेज़ार दिल को उन से भी उल्फ़त नहीं रहीबीमार-ए-ग़म की चारागरी अब न कीजिएइस को किसी इलाज की हाजत नहीं रहीआज़ुर्दा मुझ को देख के कहते हैं सब रफ़ीक़क्या हो गया तुम्हें कि बशाशत नहीं रहीजो कुछ कहा किसी ने वो चुपके से सुन लियादुनिया से अब उलझने की हिम्मत नहीं रहीदुश्वारी-ए-हयात से है क़ाफ़िया ही तंगऐसे में शेर कहने की फ़ुर्सत नहीं रहीतक़दीर ने भी अपनी नज़र मुझ से फेर लीजब से तुम्हारी चश्म-ए-इनायत नहीं रहीइस आलम-ए-वजूद पे तन्क़ीद क्या करूँअब मुझ को ऐब-जूई की आदत नहीं रहीजल्वा हर एक शय में है परवरदिगार कादिल को किसी भी चीज़ से नफ़रत नहीं रहीतेरी तजल्लियों से हुआ दिल भी जाम-ए-जमइस आइने पे गर्द-ए-कुदूरत नहीं रहीया दूर भागता था मैं अपनों के नाम सेया दुश्मनों से भी मुझे वहशत नहीं रहीज़र है कसौटी अज़्मत-ए-इंसाँ की आज-कलइल्म-ओ-हुनर की अब कोई वक़अत नहीं रहीतहज़ीब-ए-नौ ने देखिए क्या गुल खिलाए हैंमफ़क़ूद है ख़ुलूस मुरव्वत नहीं रहीगो औरतों में जज़्बा-ए-ईसार ख़त्म हैमर्दों में भी हमिय्यत-ओ-ग़ैरत नहीं रहीबाज़ार गर्म रहता है मक्र-ओ-फ़रेब कासिद्क़-ओ-सफ़ा की अब कोई क़ीमत नहीं रहीहै आदमी की ज़ात से लर्ज़ां ख़ुद आदमीअहल-ए-जहाँ के दिल में उख़ुव्वत नहीं रहीलाहौर क्या छुटा कि ज़माना बदल गयाअर्बाब-ए-ज़ौक़-ओ-शौक़ की सोहबत नहीं रहीक्या बात है कि अब तिरे शे'रों में ऐ 'बहार'वो सोज़ वो तड़प वो हरारत नहीं रही
क़रीब आओ कि जान-ए-जानाँतुम्हें सुनाऊँ वो सारी ग़ज़लेंकि जिन का मतला' तुम्हारी आँखेंवो जिन का हर एक क़ाफ़िया हैतुम्हारी ज़ुल्फ़ों की लट सरासररदीफ़ जिन की जो सच कहूँ तोतुम्हारी अंगुश्तरी का जौहरवो जिन का हर एक शे'र गोयातुम्हारी सूरत महक रहा हैवो जिन का मक़्ता' तुम्हारा रूमालजिस के ऊपर मिरा तख़ल्लुस लिखा हुआ हैक़रीब आओ कि जान-ए-जानाँतुम्हें सुनाऊँ वो सारी ग़ज़लेंकि जिन की तशरीह तुम ही तुम हो
जब तक रहे उसी के रहे उस गली में हमख़ुद को भी दरमियान से आख़िर हटा लियाबाक़ी तो ज़िंदगी की कहानी तवील हैपूछा गया तो क़ाफ़िया हम ने मिला लिया
जैसे पलकों पे उतरता हुआ इक ख़्वाब-ए-हसींइक मचलता हुआ होंटों पे हो मिसरा' जैसेइक ग़ज़ल सूरत-ए-इल्हाम उतरती जाएजैसे पानी में उतरता हुआ इकचाँद का 'अक्सइक मुसव्विर का बनाया हुआ शहकार-ए-हसींया समंदर में उतरता हुआ सूरज हो कहींया गुलाबों की बिखरती हो फ़ज़ा में ख़ुशबूलम्हा-ए-शुक्र में निकले हों ख़ुशी के आँसूमगर इन सब से कहीं बढ़ केहसीं एक ख़यालदिल पे उतरा है तो एहसास मेंशिद्दत जागीज़िंदगी ले के कई रंग सुख़न-ज़ार हुईक़ाफ़िया ले के ग़ज़ल दिल पे नुमूदार हुईइस से बढ़ कर भला दुनिया मेंहसीं क्या होगा'इश्क़ जब सूरत-ए-इल्हाम उतरताजाए
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रबक्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया होशोरिश से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेराऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा होमरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरीदामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा होआज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँदुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया होलज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों मेंचश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा होगुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी कासाग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा होहो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौनाशरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा होमानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुलनन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा होसफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे होंनद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा होहो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारापानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता होआग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ाफिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा होपानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनीजैसे हसीन कोई आईना देखता होमेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन कोसुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा होरातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दमउम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया होबिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा देजब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ होपिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िनमैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा होकानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँरौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा होफूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू करानेरोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ होइस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नालेतारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा होहर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला देबेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे
क़त्ल-गाहों से चुन कर हमारे अलमऔर निकलेंगे उश्शाक़ के क़ाफ़िलेजिन की राह-ए-तलब से हमारे क़दममुख़्तसर कर चले दर्द के फ़ासलेकर चले जिन की ख़ातिर जहाँगीर हमजाँ गँवा कर तिरी दिलबरी का भरमहम जो तारीक राहों में मारे गए
वो बर्क़ लहर बुझा दी गई है जिस की तपिशवजूद-ए-ख़ाक में आतिश-फ़िशाँ जगाती थीबिछा दिया गया बारूद उस के पानी मेंवो जू-ए-आब जो मेरी गली को आती थीसभी दुरीदा-दहन अब बदन-दरीदा हुएसपुर्द-ए-दार-ओ-रसन सारे सर-कशीदा हुए
न सर्व में वो ग़ुरूर-ए-कशीदा-क़ामती हैन क़ुमरियों की उदासी में कुछ कमी आईन खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के गुलाबन शाख़-ए-अम्न लिए फ़ाख़्ता कोई आई
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
दर्द इतना था कि उस रात दिल-ए-वहशी नेहर रग-ए-जाँ से उलझना चाहाहर बुन-ए-मू से टपकना चाहाऔर कहीं दूर तिरे सहन में गोयापत्ता पत्ता मिरे अफ़्सुर्दा लहू में धुल करहुस्न-ए-महताब से आज़ुर्दा नज़र आने लगामेरे वीराना-ए-तन में गोयासारे दुखते हुए रेशों की तनाबें खुल करसिलसिला-वार पता देने लगींरुख़्सत-ए-क़ाफ़िला-ए-शौक़ की तय्यारी काऔर जब याद की बुझती हुई शम्ओं में नज़र आया कहींएक पल आख़िरी लम्हा तिरी दिलदारी कादर्द इतना था कि उस से भी गुज़रना चाहाहम ने चाहा भी मगर दिल न ठहरना चाहा
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक़्श-गर-ए-हादसातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब अस्ल-ए-हयात-ओ-ममातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब तार-ए-हरीर-ए-दो-रंगजिस से बनाती है ज़ात अपनी क़बा-ए-सिफ़ातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब साज़-ए-अज़ल की फ़ुग़ाँजिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर-ओ-बम-ए-मुम्किनाततुझ को परखता है ये मुझ को परखता है येसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब सैरफ़ी-ए-काएनाततू हो अगर कम अयार मैं हूँ अगर कम अयारमौत है तेरी बरात मौत है मेरी बराततेरे शब-ओ-रोज़ की और हक़ीक़त है क्याएक ज़माने की रौ जिस में न दिन है न रातआनी-ओ-फ़ानी तमाम मोजज़ा-हा-ए-हुनरकार-ए-जहाँ बे-सबात कार-ए-जहाँ बे-सबातअव्वल ओ आख़िर फ़ना बातिन ओ ज़ाहिर फ़नानक़्श-ए-कुहन हो कि नौ मंज़िल-ए-आख़िर फ़नाहै मगर इस नक़्श में रंग-ए-सबात-ए-दवामजिस को किया हो किसी मर्द-ए-ख़ुदा ने तमाममर्द-ए-ख़ुदा का अमल इश्क़ से साहब फ़रोग़इश्क़ है अस्ल-ए-हयात मौत है उस पर हरामतुंद ओ सुबुक-सैर है गरचे ज़माने की रौइश्क़ ख़ुद इक सैल है सैल को लेता है थामइश्क़ की तक़्वीम में अस्र-ए-रवाँ के सिवाऔर ज़माने भी हैं जिन का नहीं कोई नामइश्क़ दम-ए-जिब्रईल इश्क़ दिल-ए-मुस्तफ़ाइश्क़ ख़ुदा का रसूल इश्क़ ख़ुदा का कलामइश्क़ की मस्ती से है पैकर-ए-गिल ताबनाकइश्क़ है सहबा-ए-ख़ाम इश्क़ है कास-उल-किरामइश्क़ फ़क़ीह-ए-हराम इश्क़ अमीर-ए-जुनूदइश्क़ है इब्नुस-सबील इस के हज़ारों मक़ामइश्क़ के मिज़राब से नग़्मा-ए-तार-ए-हयातइश्क़ से नूर-ए-हयात इश्क़ से नार-ए-हयातऐ हरम-ए-क़ुर्तुबा इश्क़ से तेरा वजूदइश्क़ सरापा दवाम जिस में नहीं रफ़्त ओ बूदरंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौतमोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूदक़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर सिल को बनाता है दिलख़ून-ए-जिगर से सदा सोज़ ओ सुरूर ओ सुरूदतेरी फ़ज़ा दिल-फ़रोज़ मेरी नवा सीना-सोज़तुझ से दिलों का हुज़ूर मुझ से दिलों की कुशूदअर्श-ए-मोअल्ला से कम सीना-ए-आदम नहींगरचे कफ़-ए-ख़ाक की हद है सिपहर-ए-कबूदपैकर-ए-नूरी को है सज्दा मयस्सर तो क्याउस को मयस्सर नहीं सोज़-ओ-गुदाज़-ए-सजूदकाफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूदशौक़ मिरी लय में है शौक़ मिरी नय में हैनग़्मा-ए-अल्लाह-हू मेरे रग-ओ-पय में हैतेरा जलाल ओ जमाल मर्द-ए-ख़ुदा की दलीलवो भी जलील ओ जमील तू भी जलील ओ जमीलतेरी बिना पाएदार तेरे सुतूँ बे-शुमारशाम के सहरा में हो जैसे हुजूम-ए-नुख़ीलतेरे दर-ओ-बाम पर वादी-ए-ऐमन का नूरतेरा मिनार-ए-बुलंद जल्वा-गह-ए-जिब्रीलमिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि हैउस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लीलउस की ज़मीं बे-हुदूद उस का उफ़ुक़ बे-सग़ूरउस के समुंदर की मौज दजला ओ दनयूब ओ नीलउस के ज़माने अजीब उस के फ़साने ग़रीबअहद-ए-कुहन को दिया उस ने पयाम-ए-रहीलसाक़ी-ए-रबाब-ए-ज़ौक़ फ़ारस-ए-मैदान-ए-शौक़बादा है उस का रहीक़ तेग़ है उस की असीलमर्द-ए-सिपाही है वो उस की ज़िरह ला-इलाहसाया-ए-शमशीर में उस की पनह ला-इलाहतुझ से हुआ आश्कार बंदा-ए-मोमिन का राज़उस के दिनों की तपिश उस की शबों का गुदाज़उस का मक़ाम-ए-बुलंद उस का ख़याल-ए-अज़ीमउस का सुरूर उस का शौक़ उस का नियाज़ उस का नाज़हाथ है अल्लाह का बंदा-ए-मोमिन का हाथग़ालिब ओ कार-आफ़रीं कार-कुशा कारसाज़ख़ाकी ओ नूरी-निहाद बंदा-ए-मौला-सिफ़ातहर दो-जहाँ से ग़नी उस का दिल-ए-बे-नियाज़उस की उमीदें क़लील उस के मक़ासिद जलीलउस की अदा दिल-फ़रेब उस की निगह दिल-नवाज़आज भी इस देस में आम है चश्म-ए-ग़ज़ालऔर निगाहों के तीर आज भी हैं दिल-नशींबू-ए-यमन आज भी उस की हवाओं में हैरंग-ए-हिजाज़ आज भी उस की नवाओं में हैदीदा-ए-अंजुम में है तेरी ज़मीं आसमाँआह कि सदियों से है तेरी फ़ज़ा बे-अज़ाँकौन सी वादी में है कौन सी मंज़िल में हैइश्क़-ए-बला-ख़ेज़ का क़ाफ़िला-ए-सख़्त-जाँदेख चुका अल्मनी शोरिश-ए-इस्लाह-ए-दींजिस ने न छोड़े कहीं नक़्श-ए-कुहन के निशाँहर्फ़-ए-ग़लत बन गई इस्मत-ए-पीर-ए-कुनिश्तऔर हुई फ़िक्र की कश्ती-ए-नाज़ुक रवाँचश्म-ए-फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाबजिस से दिगर-गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँमिल्लत-ए-रूमी-निज़ाद कोहना-परस्ती से पीरलज़्ज़त-ए-तज्दीदा से वो भी हुई फिर जवाँरूह-ए-मुसलमाँ में है आज वही इज़्तिराबराज़-ए-ख़ुदाई है ये कह नहीं सकती ज़बाँनर्म दम-ए-गुफ़्तुगू गर्म दम-ए-जुस्तुजूरज़्म हो या बज़्म हो पाक-दिल ओ पाक-बाज़नुक़्ता-ए-परकार-ए-हक़ मर्द-ए-ख़ुदा का यक़ींऔर ये आलम तमाम वहम ओ तिलिस्म ओ मजाज़अक़्ल की मंज़िल है वो इश्क़ का हासिल है वोहल्क़ा-ए-आफ़ाक़ में गर्मी-ए-महफ़िल है वोकाबा-ए-अरबाब-ए-फ़न सतवत-ए-दीन-ए-मुबींतुझ से हरम मर्तबत उंदुलुसियों की ज़मींहै तह-ए-गर्दूं अगर हुस्न में तेरी नज़ीरक़ल्ब-ए-मुसलमाँ में है और नहीं है कहींआह वो मरदान-ए-हक़ वो अरबी शहसवारहामिल-ए-ख़ल्क़-ए-अज़ीम साहब-ए-सिद्क-ओ-यक़ींजिन की हुकूमत से है फ़ाश ये रम्ज़-ए-ग़रीबसल्तनत-ए-अहल-ए-दिल फ़क़्र है शाही नहींजिन की निगाहों ने की तर्बियत-ए-शर्क़-ओ-ग़र्बज़ुल्मत-ए-यूरोप में थी जिन की ख़िरद-राह-बींजिन के लहू के तुफ़ैल आज भी हैं उंदुलुसीख़ुश-दिल ओ गर्म-इख़्तिलात सादा ओ रौशन-जबींदेखिए इस बहर की तह से उछलता है क्यागुम्बद-ए-नीलोफ़री रंग बदलता है क्यावादी-ए-कोह-सार में ग़र्क़-ए-शफ़क़ है सहाबलाल-ए-बदख़्शाँ के ढेर छोड़ गया आफ़्ताबसादा ओ पुर-सोज़ है दुख़्तर-ए-दहक़ाँ का गीतकश्ती-ए-दिल के लिए सैल है अहद-ए-शबाबआब-ए-रवान-ए-कबीर तेरे किनारे कोईदेख रहा है किसी और ज़माने का ख़्वाबआलम-ए-नौ है अभी पर्दा-ए-तक़दीर मेंमेरी निगाहों में है उस की सहर बे-हिजाबपर्दा उठा दूँ अगर चेहरा-ए-अफ़्कार सेला न सकेगा फ़रंग मेरी नवाओं की ताबजिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगीरूह-ए-उमम की हयात कश्मकश-ए-इंक़िलाबसूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौमकरती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाबनक़्श हैं सब ना-तमाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैरनग़्मा है सौदा-ए-ख़ाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैर
क्या सुनाता है मुझे turk-o-arab की दास्ताँमुझ से कुछ पिन्हाँ नहीं इस्लामियों का सोज़-ओ-साज़ले गए तसलीस के फ़रज़ंद मीरास-ए-ख़लीलख़िश्त-ए-बुनियाद-ए-कलीसा बन गई ख़ाक-ए-हिजाज़हो गई रुस्वा ज़माने में कुलाह-ए-लाला-रंगजो सरापा नाज़ थे हैं आज मजबूर-ए-नियाज़ले रहा है मय-फ़रोशान-ए-फ़रंगिस्तान से पार्सवो मय-ए-सरकश हरारत जिस की है मीना-गुदाज़हिक्मत-ए-मग़रिब से मिल्लत की ये कैफ़िय्यत हुईटुकड़े टुकड़े जिस तरह सोने को कर देता है गाज़हो गया मानिंद-ए-आब अर्ज़ां मुसलमाँ का लहूमुज़्तरिब है तू कि तेरा दिल नहीं दाना-ए-राज़गुफ़्त रूमी हर बना-ए-कुहना कि-आबादाँ कुनंदमी न-दानी अव्वल आँ बुनियाद रा वीराँ कुनंदमुल्क हाथों से गया मिल्लत की आँखें खुल गईंहक़ तिरा चश्मे 'अता कर दस्त-ए-ग़ाफ़िल दर निगरमोम्याई की गदाई से तो बेहतर है शिकस्तमोर-ए-बे-पर हाजते पेश-ए-सुलैमाने मबररब्त-ओ-ज़ब्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा है मशरिक़ की नजातएशिया वाले हैं इस नुक्ते से अब तक बे-ख़बरफिर सियासत छोड़ कर दाख़िल हिसार-ए-दीं में होमुल्क-ओ-दौलत है फ़क़त हिफ्ज़-ए-हरम का इक समरएक हूँ मुस्लिम हरम की पासबानी के लिएनील के साहिल से ले कर ता-ब-ख़ाक-ए-काश्ग़रजो करेगा इम्तियाज़-ए-रंग-ओ-ख़ूँ मिट जाएगातुर्क-ए-ख़र्गाही हो या आराबी-ए-वाला-गुहरनस्ल अगर मुस्लिम की मज़हब पर मुक़द्दम हो गईउड़ गया दुनिया से तू मानिंद-ए-ख़ाक-ए-रह-गुज़रता-ख़िलाफ़त की बिना दुनिया में हो फिर उस्तुवारला कहीं से ढूँढ़ कर अस्लाफ़ का क़ल्ब-ओ-जिगरऐ कि न-शिनासी ख़फ़ी रा अज़ जली हुशियार बाशऐ गिरफ़्तार-ए-अबु-बकर-ओ-अली हुशियार-बाश'इश्क़ को फ़रियाद लाज़िम थी सो वो भी हो चुकीअब ज़रा दिल थाम कर फ़रियाद की तासीर देखतू ने देखा सतवत-ए-रफ़्तार-ए-दरिया का 'उरूजमौज-ए-मुज़्तर किस तरह बनती है अब ज़ंजीर देख'आम हुर्रियत का जो देखा था ख़्वाब इस्लाम नेऐ मुसलमाँ आज तू उस ख़्वाब की ता'बीर देखअपनी ख़ाकिस्तर समुंदर को है सामान-ए-वजूदमर के फिर होता है पैदा ये जहान-ए-पीर देखखोल कर आँखें मिरे आईना-ए-गुफ़्तार मेंआने वाले दौर की धुँदली सी इक तस्वीर देखआज़मूदा फ़ित्ना है इक और भी गर्दूं के पाससामने तक़दीर के रुस्वाई-ए-तदबीर देखमुस्लिम अस्ती सीना रा अज़ आरज़ू-आबाद दारहर ज़माँ पेश-ए-नज़र ला-युख़लिफ-उल-मीआद दार
सैकड़ों हसन नासिरहैं शिकार नफ़रत केसुब्ह-ओ-शाम लुटते हैंक़ाफ़िले मोहब्बत केजब से काले बाग़ों नेआदमी को घेरा हैमिशअलें करो रौशनदूर तक अँधेरा हैमेरे देस की धरतीप्यार को तरसती हैपत्थरों की बारिश हीइस पे क्यूँ बरसती हैमुल्क को बचाओ भीमुल्क के निगहबानोदस करोड़ इंसानो!बोलने पे पाबंदीसोचने पे ताज़ीरेंपाँव में ग़ुलामी कीआज भी हैं ज़ंजीरेंआज हरफ़-ए-आख़िर हैबात चंद लोगों कीदिन है चंद लोगों कारात चंद लोगों कीउठ के दर्द-मंदों केसुब्ह-ओ-शाम बदलो भीजिस में तुम नहीं शामिलवो निज़ाम बदलो भीदोस्तों को पहचानोदुश्मनों को पहचानोदस करोड़ इंसानो!
गुल हुई जाती है अफ़्सुर्दा सुलगती हुई शामधुल के निकलेगी अभी चश्मा-ए-महताब से रातऔर मुश्ताक़ निगाहों की सुनी जाएगीऔर उन हाथों से मस होंगे ये तरसे हुए हातउन का आँचल है कि रुख़्सार कि पैराहन हैकुछ तो है जिस से हुई जाती है चिलमन रंगींजाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम घनी छाँव मेंटिमटिमाता है वो आवेज़ा अभी तक कि नहींआज फिर हुस्न-ए-दिल-आरा की वही धज होगीवही ख़्वाबीदा सी आँखें वही काजल की लकीररंग-ए-रुख़्सार पे हल्का सा वो ग़ाज़े का ग़ुबारसंदली हाथ पे धुंदली सी हिना की तहरीरअपने अफ़्कार की अशआर की दुनिया है यहीजान-ए-मज़मूँ है यही शाहिद-ए-मअ'नी है यहीआज तक सुर्ख़ ओ सियह सदियों के साए के तलेआदम ओ हव्वा की औलाद पे क्या गुज़री है?मौत और ज़ीस्त की रोज़ाना सफ़-आराई मेंहम पे क्या गुज़रेगी अज्दाद पे क्या गुज़री है?इन दमकते हुए शहरों की फ़रावाँ मख़्लूक़क्यूँ फ़क़त मरने की हसरत में जिया करती हैये हसीं खेत फटा पड़ता है जौबन जिन का!किस लिए इन में फ़क़त भूक उगा करती हैये हर इक सम्त पुर-असरार कड़ी दीवारेंजल-बुझे जिन में हज़ारों की जवानी के चराग़ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों की मक़्तल-गाहेंजिन के परतव से चराग़ाँ हैं हज़ारों के दिमाग़ये भी हैं ऐसे कई और भी मज़मूँ होंगेलेकिन उस शोख़ के आहिस्ता से खुलते हुए होंटहाए उस जिस्म के कम्बख़्त दिल-आवेज़ ख़ुतूतआप ही कहिए कहीं ऐसे भी अफ़्सूँ होंगे
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