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नज़्म
उन के लहजे में वो कुछ लोच वो झंकार वो रस
एक बे-क़स्द तरन्नुम के सिवा कुछ भी न था
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
शाइ'री की उम्र थी गो बीस या पच्चीस साल
लेकिन अपने फ़न में वो बिल-क़स्द लाए बाल-पन
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
हिंदुओं को चाहिए कि क़स्द का'बा का करें
और फिर मुस्लिम बढ़ें गंग-ओ-जमन के वास्ते
कुंवर प्रताप चंद्र आज़ाद
नज़्म
जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं
कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
जी में आता है ये मुर्दा चाँद तारे नोच लूँ
इस किनारे नोच लूँ और उस किनारे नोच लूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तले
खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम