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नज़्म
मौजज़न है जिस में ऐ चर्ख़ इक सुरूर-ए-सरमदी
मेरी दुनिया है तसद्दुक़ इस छलकते जाम पर
चरख़ चिन्योटी
नज़्म
कुफ्र-ओ-बातिल के उड़े हाथों के तोते ऐ 'चर्ख़'
हक़-परस्ती का वो यूँ डंका बजाता आया
चरख़ चिन्योटी
नज़्म
ऐ शफ़क़ ऐ ज़ेवर-ए-आराइश-ए-चर्ख़-ए-बरीं
तुझ में वो शोख़ी है जो ख़ून-ए-शहीदाँ में नहीं
साक़िब कानपुरी
नज़्म
इक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुला
वा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुला
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
निज़ाम-ए-चर्ख़ में देखेंगे इक तग़य्युर-ए-ख़ास
सुकून-ए-दहर में इक इज़्तिराब देखेंगे
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
हम को गर तू ने रुलाया तो रुलाया ऐ चर्ख़
हम पे ग़ैरों को तो ज़ालिम न हँसाना हरगिज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
हम को गर तू ने रुलाया तो रुलाया ऐ चर्ख़
हम पे ग़ैरों को तो ज़ालिम न हँसाना हरगिज़