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नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिंद
सब फ़लसफ़ी हैं ख़ित्ता-ए-मग़रिब के राम-ए-हिंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारे
इन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' का
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
तबाही की हवा इस ख़ाक-ए-रंगीं तक न आई थी
ये वो ख़ित्ता था जिस में नौ-बहारों की ख़ुदाई थी
अख़्तर शीरानी
नज़्म
पस-ए-मर्ग ख़ाक हुए बदन वो कफ़न में हों कि हों बे-कफ़न
न मिरी लहद कोई और है न तिरी चिता कोई और है
दिलावर फ़िगार
नज़्म
ज़बाँ को बंद किया है ये ग़ाफ़िलों को है नाज़
ज़रा रगों में लहू का भी देख लें अंदाज़
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
ख़ुदा ने तुझ को पयम्बर किया यहाँ के लिए
कि तेरे हाथ में नाक़ूस था अज़ाँ के लिए