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नज़्म
कहीं कोई नासूर नहीं गो हाएल है बरसों का फ़िराक़
किर्म-ए-फ़रामोशी ने देखो चाट लिए कितने मीसाक़
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
ये जा कर कोई बज़्म-ए-ख़ूबाँ में कह दो
कि अब दर-ख़ोर-ए-बज़्म-ए-ख़ूबाँ नहीं मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
तुझे सब ढूँडते हैं इस तरह अंधे हैं सब जैसे
इसी कोरे वरक़ पर कुछ इबारत भी उन्हें दे दे
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
अली अकबर नातिक़
नज़्म
थीं सिवइयाँ क़ोरमा शीर और बिरयानी कबाब
हम उठे ख़ुश-ज़ाएक़ा खानों से हो कर फ़ैज़याब
मुर्तजा साहिल तस्लीमी
नज़्म
जो बद-रंग है हाल की तरह और कोरे लट्ठे की बू से भरी है
हमारे लिए सिर्फ़ रोटी की जिद्द-ओ-जोहद
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
कोरे अल्फ़ाज़ की सौग़ात कहाँ से लाऊँ
ख़ुश्क आँखों के कटोरों से मैं बरसात कहाँ से लाऊँ