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नज़्म
'मुनीर' आसाँ नहीं है राह-ए-उल्फ़त से गुज़रना भी
ये लाज़िम है कि हो ले ख़ूगर-ए-ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ पहले
मुनीर वाहिदी
नज़्म
राह-ए-उल्फ़त में कभी होगा तिरा साथ ये कहना है मुझे
तुम कहोगी मैं ज़माने का चलन जान गई
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
जो कुछ रह-ए-उल्फ़त में 'तकमील' पे गुज़री है
अफ़्साना-दर-अफ़्साना तहरीर करो यारो