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नज़्म
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की
उस रंग-रंगीली मज्लिस में वो रंडी नाचने वाली हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जो रंडी-बाज़ हैं वो बहुत दिल में शाद हो
क्या क्या अनार छोड़े हैं बिशनी हो रू-ब-रू
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
क्या रेनी ख़ंदक़ रन्द बड़े क्या ब्रिज कंगूरा अनमोला
गढ़ कोट रहकला तोप क़िला क्या शीशा दारू और गोला
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
लेकिन मैं तो इक मुंशी हूँ तू ऊँचे घर की रानी है
ये मेरी प्रेम-कहानी है और धरती से भी पुरानी है