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नज़्म
हर इक शय उसी घूमती खाई की तह की जानिब उतरती चली जा रही थी
हवाओं का तूफ़ान रेलों का खड़कार आहन-रुबा की
इक़तिदार जावेद
नज़्म
चुन लिया राह के रेज़ों को ख़ज़फ़-रेज़ों को
और समझ बैठे कि बस लाल-ओ-जवाहर हैं यही
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
राह गुम कर दूँ की मशअ'ल इस के लब पर आओ आओ
तेरे माज़ी के ख़ज़फ़ रेज़ों से जागी है ये आग
नून मीम राशिद
नज़्म
मैं जब उस से मिलने जाता हूँ अकेले रास्ते पर
अन-गिनत आँखें सितारों संग-रेज़ों पत्तियों की