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नज़्म
हुई अँगूर की बेटी से ''मस्ती-ख़ान'' की शादी
खुले दर मय-कदों के और मिली रिंदों को आज़ादी
मजीद लाहौरी
नज़्म
जब बरखा की रुत आती है जब काली घटाएँ उठती हैं
जिस वक़्त कि रिंदों के दिल से हू-हक़ की सदाएँ उठती हैं
बहज़ाद लखनवी
नज़्म
चुन लिया राह के रेज़ों को ख़ज़फ़-रेज़ों को
और समझ बैठे कि बस लाल-ओ-जवाहर हैं यही
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
असातीर फ़रमाँ-रवाओं के अहकाम और सूफ़िया की करामत के क़िस्से
पयम्बर की दिल-सोज़ियों के मज़ाहिर