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नज़्म
ये जो रिश्ता-दार था हम सब का लेकिन दूर का
मिल के मालिक ने इसे रुत्बा दिया मंसूर का
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
मेरे इक साले की इक ससुराल का इक रिश्ता-दार
अपनी कोशिश से मुलाज़िम हो गया था एक बार
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
कोई दौलत-मंद इंसाँ हो कि हो कोई ग़रीब
कोई रिश्ते-दार हम-साया हो या कोई रक़ीब
मुर्तजा साहिल तस्लीमी
नज़्म
तेरे रिश्ते-दार भी हैं अब तिरे बद-ख़्वाह देख
कर रहे हैं जो तुझे सुब्ह-ओ-मसा गुमराह देख