aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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रेत मुट्ठी में कभी ठहरी हैप्यास से उस को इलाक़ा क्या हैउम्र का कितना बड़ा हिस्सा गँवा बैठा मैंजानते बूझते किरदार ड्रामे का बनाऔर इस रोल को सब कहते हैंहोशियारी से निभाया मैं नेहँसने के जितने मक़ाम आए हँसाबस मुझे रोने की साअत पे ख़जिल होना पड़ाजाने क्यूँ रोने के हर लम्हे कोटाल देता हूँ किसी अगली घड़ी परदिल में ख़ौफ़ ओ नफ़रत को सजा लेता हूँमुझ को ये दुनिया भली लगती है
तोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाएउल्लू जब मिर्दंग बजाए कव्वा शोर मचाएकुकड़ूँ कूँ की तान लगा के मुर्ग़ा गाय ख़यालक़ुमरी अपनी ठुमरी गाय मुर्ग़ी देवे तालमोर अपनी दुम को फैला कर कत्थक नाच दिखाएतोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाएचिड़िया बाजी सभा में नाचे ख़ुशी से छम छम छममोटी बतख़ चोंच से ढोलक पीटे धम धम धमबया बजाए मनजेरे और भौंरा भजन उड़ाएतोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाएबुलबुल गुल की याद में रो-रो गाए दीपक रागमस्त पपीहा दूर से नग़्मों की भड़काए आगकोयल पहन के पायल सारी महफ़िल में इठलाएतोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाएरंग बिरंगी चिड़ियाँ अब छेड़ें ऐसी क़व्वालीपत्ता पत्ता बूटा बूटा ताल में देवे तालीफूफी चील वज्द में आ कर ऊँची तान लगाएतोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाएइंग्लिस्तान का सारस आ कर नाचे राक ऐन रोलमुर्ग़ाबी से बोले मैडम इंग्लिश गाना बोलदेखो देखो कितनी प्यारी महफ़िल है ये हाएतोता छेड़े थप-थप तबला मैना गीत सुनाए
ज़िंदगी में है सफ़र का अपना रोलबढ़ता है लोगों से बच्चो मेल-जोल
प्रेम कहे तब मीठे बोलमत आँसुओं के मोती रोलभूले-बिसरे प्रेम-पुजारीप्रेम की जोगन तेरी लगन मेंखोए हुए क़िस्मत के तारेक्यों तू ढूँढे नील गगन मेंआन के बस जा मेरे मन मेंप्रेम की मुद्रा प्यासे तन मेंलगी हिलोरे लेनेजल्दी से पहचान ले मुझ कोप्रेम ही दे निरवान भी तुझ कोप्रेम की जोगनसजल सलोनीदेती है संदेसाबस्ती बस्तीपर्बत पर्बतगाती गीत अलबेला
तुम मुझ पर वारिद हुएइक सितमगर की तरहमई की वो शाम थीमुझे आज भी याद हैसफ़ेद रंग की शर्ट पहनेहाथ में अख़बार रोल किएतुम पिंडाल की कुर्सी पर बिराजमान थेपहली नज़र में तुम आम से थेजैसे तुम आशिक़ हो और मैं महबूबमेरी नज़र का लम्स तुम्हें ख़ासा ख़ास कर गयादेखोकहानी ने पल्टा खायातुम मुहिब बन गए और मैं दीवानी कहलाईमेरे आते ही तुम सिमट गएतब से आज तक वैसे ही मेरी रूह मेंएक कोंपल की तरह सिमटे बैठे होमैं मुंतज़िर हूँकब एहसास का नाज़ुक परिंदा अंगड़ाई लेतुम अपनी बाँहें फैलाएइसी पिंडाल की इसी कुर्सी परगहरी ख़ामोशी से शोर करते हुएमेरी तरफ़ बढ़ोकि देखने वालों को पाकीज़ा मोहब्बतरक़्स करती दिखाई देजिस में न नुमाइश हो न हवसबस इक सुरूर होऔर मैंमैं ज़मीन के इसी बे-बस बे-हिस टुकड़े पर आँखें मूँदे तुम्हें देखती रहूँपछतावे का जाल आज तक मुझे लपेट में जकड़े हैमैं किसी असीर-ज़ादी की तरहअपनी क़ैद को तक़दीर का लिखा जान कर ख़ुश हूँमैं इज़हार-ओ-इक़रार से बरीअपनी ख़्वाहिश पर हया की चादर डालेमोहब्बत का तौक़ गले में लटकाएख़मोशी को लबों पर सजाएना-उम्मीदी को शिकस्त देते हुएगूँगी बहरी अंधी मोहब्बत पर इक्तिफ़ा किए हुए हूँकि असीर ख़्वाहिश-ओ-फ़रमाइश का हक़ नहीं रखते
हरे-भरे लहराते पत्तों वाला पेड़इन्दर से किस दर्जा बोदा कितना खोखला हो सकता हैमुझ से पूछोमैं इक ऐसे ही छितनार के नीचे बैठाउस की छाँव से अपने सफ़र कीधूप का दुखड़ा फूल रहा थाआने वाले वक़्त की ठंडी गीली मिट्टी रोल रहा थाअपने आप से बोल रहा थामैं भी कितना ख़ुश-क़िस्मत हूँजीवन की सुनसान डगर परमेरे कितने यार खड़े हैं पेड़ की सूरतइतने में इक झोंका आयाये झोंका चाँदी की कान के अंदर से हो कर आया थाएक ही पल मेंपेड़ की छाल ने रंगत बदलीएक ही पल मेंहर पत्ते की शक्ल हुई मटियाली गदलीशाँ शाँ करती शाख़ों में इक ज़हरीली सरगोशी जागीछाँव छट कर पेड़ के तन की जानिब भागीदिल ये मंज़र देख के सहमा काँपा रोयाचारों और से उठती इक अनजाने दुख की धूल में खोयाज़हर सा इक रग रग में समायाइतने में इक और झूमता झोंका आयाये झोंका ख़ुद-ग़र्ज़ी के कोहसार पे मंडला कर आया थाबस इतना ही याद है मुझ कोकैसे और कब पेड़ गिरा ये पेड़ से पूछोमुझे निकालोउस बूदे और खोखले पेड़ के नीचे दब करमेरे साथ मिरा एहसास भी मर जाएगाजो भी ये मंज़र देखेगा डर जाएगादेखने वालों को इस ख़ौफ़ से इस सदमे इस ग़म से बचा लोमुझे निकालोआइंदा मैं छितनार को अपना यार नहीं समझूँगाकभी कभी मिल जाने वाली छाँव को प्यार नहीं समझूँगा
परचम सर-ए-मैदान-ए-विग़ा खोल रहा हैमंसूर के पर्दे में ख़ुदा बोल रहा हैक्या सैल-ए-बग़ावत है मुरीदों की सफ़ों मेंपीरान-ए-तही-दस्त का दिल डोल रहा हैऐ वाए सबा अक़रब-ए-जर्रारा चमन मेंसरसर के इशारात पे बिस घोल रहा हैअफ़रंग के देरीना ग़ुलामों की रज़ा परख़ुद पीर-ए-हरम बंद-ए-क़बा खोल रहा हैकुछ बात ही ऐसी है कि पैमाना-ए-ज़र मेंइक रिंद-ए-तुनुक-ज़र्फ़ लहू तोल रहा हैबुज़-ग़ाला-ए-अफ़रंग शगालों के जिलौ मेंकिस ठाठ से ज़रग़ाम-सिफ़त बोल रहा हैतारीख़ के वीराना-ए-आबाद में 'शोरिश'कुछ क़ीमती मोती हैं क़लम रोल रहा है
अगर माज़ूर होचुस्ती से पुर लोगों को देखोअंधेरे मुँह वो, इक अख़बार वालागुज़िश्ता रोज़ की सब लानतों को रोल कर केतुम्हारे बंद दरवाज़े पेकब का फेंक कर जा भी चुका हैतुम्हारा दूध वालाशीर-ख़्वारों की सुब्ह होने से पहलेदूध दे कर जा चुका हैअगर माज़ूर होखिड़की के शीशों से चिपक कर बैठ जाओऔर देखोकि ये स्कूल जाते हूर ओ ग़िल्माँकितने भारी बैग थामेहँसते गाते जा रहे हैंउन के सर के ठीक ऊपरचहचहाते ग़ोल चिड़ियों केतलाश-ए-रिज़्क़ में जाते हुए देखोअगर माज़ूर होशामिल नहीं हो गहमागहमी मेंतो क्याखिड़की के शीशों से चिपक कर बैठ जाओ
जब नूर के पर्दे से हटा पर्दा-ए-ज़ुल्मातजब सुब्ह के माथे से मिटी गर्द-ए-ख़ुराफ़ातपौ फूटने वाली थी तो मशरिक़ था हिनाईमिलने को थी दुनिया को शुआ'ओं की बधाईसहमी हुई उतरी तो थी आकाश से शबनमग़ुंचों को तबस्सुम का वो पैग़ाम थी ताहमकलियों को जो बदमस्त हवा चूम रही थीइस छेड़ पर हर शाख़-ए-चमन झूम रही थीचिड़ियों की चहक दूर से देती थी सुनाईउड़ने की जसारत अभी उन में न थी आईसब्ज़ा कहीं चुप-चाप गुहर रोल रहा थागुल हँस के कहीं बंद-ए-क़बा खोल रहा थाफ़ितरत के पुजारी भी बहुत जाग चुके थेसैरों के लिए लोग भी कुछ भाग चुके थेतक़्दीस के पाबंद भी गंगा के किनारेजाते थे कहीं तेज़ कहीं सुस्त बेचारेपूजा कोई करता था तिलक कोई बनाताजल हाथ में लेता कोई माथे पे लगाताइतने में नुमायाँ हुआ इक पैकर-ए-नूरीक़दमों में शफ़क़ जिस के पड़ी बहर-ए-हुज़ूरीसाँचे में ढले जैसे कि अंदाम थे सारेलपके वो क़दम चूमने बहते हुए धारेबोझल थी पलक नींद के बे-साख़्ता-पन सेछुटती थी किरन जैसे कि हर मू-ए-बदन सेथाली जो उठाए थी तो दिल वालों को महमेज़महजूब हुआ देख के ख़ुर्शीद-ए-सहर-ख़ेज़सारी की सँभाले हुए चुटकी से थी चूननबढ़ती थी उसे देख के हर क़ल्ब की धड़कनदरिया में धरे पाँव बड़े नाज़-ओ-अदा सेपरियाँ सी लपकने लगीं पानी की रिदा सेरुक रुक के जो दो-चार क़दम और बढ़ाएचूनन को सँभाले हुए थाली को उठाएनज़राना दिया फूल का अमवाज को उस नेथाली को लिया ख़ादिमा-ए-ख़ास ने बढ़ केफिर आब-ए-मुक़द्दस में जो डुबकी सी लगाईबदली सी ज़रा देर को महताब पे छाईपानी से परी पर को झटकती हुई निकलीअंदाम-ए-गुल-अंदाम से लिपटी हुई सारीमोती से बरसते थे हर इक मू-ए-सियह सेशबनम के वो क़तरे थे कँवल पर जो पड़े थेवो मस्त-ए-ख़िराम आई उसी तौर गई भीपर बर्क़-ए-तपाँ ख़िर्मन-ए-हस्ती पर गिरी भी
मैं इश्क़ का असीर थावो इश्क़ को क़फ़स कहेकि उम्र भर के साथ कोवो बद-तर-अज़-हवस कहे
तआ'रुफ़ रोग हो जाए तो उस का भूलना बेहतरत'अल्लुक़ बोझ बन जाए तो उस को तोड़ना अच्छावो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिनउसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
मैं ने माना कि शब ओ रोज़ के हंगामों मेंवक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ताचाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ता
फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहींराह-रौ होगा कहीं और चला जाएगाढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबारलड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़सो गई रास्ता तक तक के हर इक राहगुज़ारअजनबी ख़ाक ने धुँदला दिए क़दमों के सुराग़गुल करो शमएँ बढ़ा दो मय ओ मीना ओ अयाग़अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लोअब यहाँ कोई नहीं कोई नहीं आएगा
पहले भी तो गुज़रे हैंदौर ना-रसाई के ''बे-रिया'' ख़ुदाई केफिर भी ये समझते हो हेच आरज़ू-मंदीये शब-ए-ज़बाँ-बंदी है रह-ए-ख़ुदा-वंदीतुम मगर ये क्या जानोलब अगर नहीं हिलते हाथ जाग उठते हैंहाथ जाग उठते हैं राह का निशाँ बन करनूर की ज़बाँ बन करहाथ बोल उठते हैं सुब्ह की अज़ाँ बन कररौशनी से डरते होरौशनी तो तुम भी हो रौशनी तो हम भी हैंरौशनी से डरते होशहर की फ़सीलों परदेव का जो साया था पाक हो गया आख़िररात का लिबादा भीचाक हो गया आख़िर ख़ाक हो गया आख़िरइज़्दिहाम-ए-इंसाँ से फ़र्द की नवा आईज़ात की सदा आईराह-ए-शौक़ में जैसे राह-रौ का ख़ूँ लपकेइक नया जुनूँ लपकेआदमी छलक उट्ठेआदमी हँसे देखो शहर फिर बसे देखोतुम अभी से डरते हो?हाँ अभी तो तुम भी होहाँ अभी तो हम भी हैंतुम अभी से डरते हो
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहींतोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहींआज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलोदस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलोख़ाक-बर-सर चलो ख़ूँ-ब-दामाँ चलोराह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलोहाकिम-ए-शहर भी मजमा-ए-आम भीतीर-ए-इल्ज़ाम भी संग-ए-दुश्नाम भीसुब्ह-ए-नाशाद भी रोज़-ए-नाकाम भीउन का दम-साज़ अपने सिवा कौन हैशहर-ए-जानाँ में अब बा-सफ़ा कौन हैदस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है
फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूटा झूटी पीत हमारी होफ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में साँस भी हम पर भारी हो
उस ने कहासुनअहद निभाने की ख़ातिर मत आनाअहद निभाने वाले अक्सरमजबूरी या महजूरी की थकन से लौटा करते हैंतुम जाओऔर दरिया दरिया प्यास बुझाओजिन आँखों में डूबोजिस दिल में उतरोमेरी तलब आवाज़ न देगीलेकिन जब मेरी चाहतऔर मिरी ख़्वाहिश की लौइतनी तेज़ और इतनीऊँची हो जाएजब दिल रो देतब लौट आना
अपने बिस्तर पे बहुत देर से मैं नीम-दराज़सोचती थी कि वो इस वक़्त कहाँ पर होगामैं यहाँ हूँ मगर उस कूचा-ए-रंग-ओ-बू मेंरोज़ की तरह से वो आज भी आया होगाऔर जब उस ने वहाँ मुझ को न पाया होगा!?
जिसे फ़न कहते आए हैं वो है ख़ून-ए-जिगर अपनामगर ख़ून-ए-जिगर क्या है वो है क़त्ताल-तर अपनाकोई ख़ून-ए-जिगर का फ़न ज़रा ताबीर में लाएमगर मैं तो कहूँ वो पहले मेरे सामने आएवजूद ओ शेर ये दोनों define हो नहीं सकतेकभी मफ़्हूम में हरगिज़ ये काइन हो नहीं सकतेहिसाब-ए-हर्फ़ में आता रहा है बस हसब उन कानहीं मालूम ईज़द ईज़दाँ को भी नसब उन काहै ईज़द ईज़दाँ इक रम्ज़ जो बे-रम्ज़ निस्बत हैमियाँ इक हाल है इक हाल जो बे-हाल-ए-हालत हैन जाने जब्र है हालत कि हालत जब्र है यानीकिसी भी बात के मअनी जो हैं उन के हैं क्या मअनीवजूद इक जब्र है मेरा अदम औक़ात है मेरीजो मेरी ज़ात हरगिज़ भी नहीं वो ज़ात है मेरीमैं रोज़-ओ-शब निगारिश-कोश ख़ुद अपने अदम का हूँमैं अपना आदमी हरगिज़ नहीं लौह-ओ-क़लम का हूँ
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