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नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
न ख़ातूनों में रह जाएगी पर्दे की ये पाबंदी
न घूँघट इस तरह से हाजिब-ए-रू-ए-सनम होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
रू-ए-ज़मीन पर दरिया से ज़्यादा मोहब्बत करने वाला कोई नहीं
दरिया अपने समुंदर की तरफ़ बहता रहता है
सरवत हुसैन
नज़्म
साज़-ए-दौलत को अता करती है नग़्मे जिस की आह
माँगता है भीक ताबानी की जिस से रू-ए-शाह
जोश मलीहाबादी
नज़्म
न बात अब तक सुनी गई है
शराब-ओ-शेर-ओ-शुऊ'र का जो इक तअ'ल्लुक़ है उस के बारे में राय क्या है
तारिक़ क़मर
नज़्म
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
तुझ को अपनाने की हिम्मत है न खो देने का ज़र्फ़
कभी हँसते कभी रोते हुए सो जाता हूँ मैं