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नज़्म
मुझ से मिलने में अब अंदेशा-ए-रुस्वाई है
मैं ने ख़ुद अपने किए की ये सज़ा पाई है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अहमद हातिब सिद्दीक़ी
नज़्म
उन की रातें ख़ौफ़-ए-रुस्वाई से होंगी जब दराज़
तेरे सीने में किसी शब का न होगा कोई राज़
जोश मलीहाबादी
नज़्म
फिर इक दिन उन की क़िस्मत में लिखी जाती है रुस्वाई
ज़माने में समझते हैं जो कारोबार औरत को