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नज़्म
उन की रातें ख़ौफ़-ए-रुस्वाई से होंगी जब दराज़
तेरे सीने में किसी शब का न होगा कोई राज़
जोश मलीहाबादी
नज़्म
फिर इक दिन उन की क़िस्मत में लिखी जाती है रुस्वाई
ज़माने में समझते हैं जो कारोबार औरत को
अरशद महमूद अरशद
नज़्म
तुम ने लिक्खा है मिरे ख़त मुझे वापस कर दो
डर गईं हुस्न-ए-दिल-आवेज़ की रुस्वाई से