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नज़्म
मैं जुगनू बन के तो तुझ तक पहुँच नहीं सकता
जो तुझ से हो सके ऐ माँ तू वो तरीक़ा बता
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
ऐ इश्क़-ए-अज़ल-गीर ओ अबद-ताब
कुछ ख़्वाब कि मदफ़ून हैं अज्दाद के ख़ुद-साख़्ता अस्मार के नीचे