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नज़्म
नागाह लहकते खेतों से टापों की सदाएँ आने लगीं
बारूद की बोझल बू ले कर पच्छिम से हवाएँ आने लगीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जब बरखा की रुत आती है जब काली घटाएँ उठती हैं
जिस वक़्त कि रिंदों के दिल से हू-हक़ की सदाएँ उठती हैं
बहज़ाद लखनवी
नज़्म
अभी चमकने वाली है छुपी हुई हक़ीक़तें
अभी तो बहर-ओ-बर पे सो रही हैं मेरी वो सदाएँ