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नज़्म
मेरा वजूद यक-ब-यक अनासिर का ढेर लगता है
और मैं ख़ुद से ही घबरा जाती हूँ सहम जाती हूँ
ज्योती आज़ाद खतरी
नज़्म
कँवल मलिक
नज़्म
मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं
तिरे फ़िराक़ में यूँ सुब्ह ओ शाम करते हैं