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नज़्म
और दबे दबे लहजे में कहे तुम ने अब तक बड़े दर्द सहे
तुम तन्हा तन्हा जलते रहे तुम तन्हा तन्हा चलते रहे
साक़ी फ़ारुक़ी
नज़्म
अहद-ए-तिफ़्ली ही से दुनिया के बड़े ज़ुल्म सहे
अब भी हर अहल-ए-सुख़न आप को उस्ताद कहे
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
क़ौम की इस्लाह-ओ-ख़िदमत में हज़ारों दुख सहे
आंधियों की ज़द पे तुम करते रहे रौशन दिए
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
इस वतन के वास्ते क्या क्या सहे रंज-ओ-मेहन
नाज़ के क़ाबिल है उन की जाँ-निसारी का चलन
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
मगर ये अपना मुक़द्दर कि रहज़नों के सबब
क़दम क़दम पे उठाए फ़रेब-ए-ज़ख़्म सहे