aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "sake"
चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हेंऔर ये सब दरीचा-हा-ए-ख़यालजो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैंबंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँयाद की इक किरन भी आ न सके
गर इश्क़ किया है तब क्या है क्यूँ शाद नहीं आबाद नहींजो जान लिए बिन टल न सके ये ऐसी भी उफ़्ताद नहींये बात तो तुम भी मानोगे वो 'क़ैस' नहीं फ़रहाद नहींक्या हिज्र का दारू मुश्किल है क्या वस्ल के नुस्ख़े याद नहींये बातें झूटी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैंतुम 'इंशा'-जी का नाम न लो क्या 'इंशा'-जी सौदाई हैं
न सर्व में वो ग़ुरूर-ए-कशीदा-क़ामती हैन क़ुमरियों की उदासी में कुछ कमी आईन खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के गुलाबन शाख़-ए-अम्न लिए फ़ाख़्ता कोई आई
उन्ही के साए में फिर आज दो धड़कते दिलख़मोश होंटों से कुछ कहने सुनने आए हैं
वो 'जौन' जो नज़र आता है उस का ज़िक्र नहींतुम अपने 'जौन' का जो तुम में है भरम रखनाअजीब बात है जो तुम से कह रही हूँ मैंख़याल मेरा ज़ियादा और अपना कम रखनाहो तुम बला के बग़ावत-पसंद तल्ख़-कलामख़ुद अपने हक़ में इक आज़ार हो गए हो तुमतुम्हारे सारे सहाबा ने तुम को छोड़ दियामुझे क़लक़ है कि बे-यार हो गए हो तुम
ऐ अन्फ़ुस ओ आफ़ाक़ में पैदा तिरी आयातहक़ ये है कि है ज़िंदा ओ पाइंदा तिरी ज़ातमैं कैसे समझता कि तू है या कि नहीं हैहर दम मुतग़य्यर थे ख़िरद के नज़रियातमहरम नहीं फ़ितरत के सुरूद-ए-अज़ली सेबीना-ए-कवाकिब हो कि दाना-ए-नबातातआज आँख ने देखा तो वो 'आलम हुआ साबितमैं जिस को समझता था कलीसा के ख़ुराफ़ातहम बंद-ए-शब-ओ-रोज़ में जकड़े हुए बंदेतू ख़ालिक़-ए-आसार-ओ-निगारंदा-ए-आनातइक बात अगर मुझ को इजाज़त हो तो पूछूँहल कर न सके जिस को हकीमों के मक़ालातजब तक मैं जिया ख़ेमा-ए-अफ़्लाक के नीचेकाँटे की तरह दिल में खटकती रही ये बातगुफ़्तार के उस्लूब पे क़ाबू नहीं रहताजब रूह के अंदर मुतलातुम हों ख़यालातवो कौन सा आदम है कि तू जिस का है मा'बूदवो आदम-ए-ख़ाकी कि जो है ज़ेर-ए-समावातमशरिक़ के ख़ुदावंद सफ़ेदान-ए-रंगीमग़रिब के ख़ुदावंद दरख़्शंदा फ़िलिज़्ज़ातयूरोप में बहुत रौशनी-ए-इल्म-ओ-हुनर हैहक़ ये है कि बे-चश्मा-ए-हैवाँ है ये ज़ुल्मातरानाई-ए-तामीर में रौनक़ में सफ़ा मेंगिरजों से कहीं बढ़ के हैं बैंकों की इमारातज़ाहिर में तिजारत है हक़ीक़त में जुआ हैसूद एक का लाखों के लिए मर्ग-ए-मुफ़ाजातये 'इल्म ये हिकमत ये तदब्बुर ये हुकूमतपीते हैं लहू देते हैं तालीम-ए-मुसावातबेकारी ओ 'उर्यानी ओ मय-ख़्वारी ओ इफ़्लासक्या कम हैं फ़रंगी मदनियत की फ़ुतूहातवो क़ौम कि फ़ैज़ान-ए-समावी से हो महरूमहद उस के कमालात की है बर्क़ ओ बुख़ारातहै दिल के लिए मौत मशीनों की हुकूमतएहसास-ए-मुरव्वत को कुचल देते हैं आलातआसार तो कुछ कुछ नज़र आते हैं कि आख़िरतदबीर को तक़दीर के शातिर ने किया मातमय-ख़ाना की बुनियाद में आया है तज़लज़ुलबैठे हैं इसी फ़िक्र में पीरान-ए-ख़राबातचेहरों पे जो सुर्ख़ी नज़र आती है सर-ए-शामया ग़ाज़ा है या साग़र ओ मीना की करामाततू क़ादिर ओ 'आदिल है मगर तेरे जहाँ मेंहैं तल्ख़ बहुत बंदा-ए-मज़दूर के औक़ातकब डूबेगा सरमाया-परस्ती का सफ़ीनादुनिया है तिरी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-मुकाफ़ात
जो रुक सके तो रोक दो ये सैल रंग-ओ-नूर कामिरी नज़र को चाहिए वही चराग़ दूर काखटक रही है हर किरन नज़र में ख़ार की तरहछुपा दिया है ताबिशों ने आइना शुऊर कानिगाह-ए-शौक़ जल उठी हिजाब ढूँढता हूँ मैंजिन्हें सहर निगल गई वो ख़्वाब ढूँढता हूँ मैंकहाँ गई वो नींद की शराब ढूँढता हूँ मैं
ज़िंदगी के मैले में ख़्वाहिशों के रेले मेंतुम से क्या कहें जानाँ इस क़दर झमेले मेंवक़्त की रवानी है बख़्त की गिरानी हैसख़्त बे-ज़मीनी है सख़्त ला-मकानी हैहिज्र के समुंदर मेंतख़्त और तख़्ते की एक ही कहानी हैतुम को जो सुनानी हैबात गो ज़रा सी हैबात उम्र-भर की हैउम्र-भर की बातें कब दो-घड़ी में होती हैंदर्द के समुंदर मेंअन-गिनत जज़ीरे हैं बे-शुमार मोती हैंआँख के दरीचे में तुम ने जो सजाया थाबात उस दिए की हैबात उस गिले की हैजो लहू की ख़ल्वत में चोर बन के आता हैलफ़्ज़ की फ़सीलों पर टूट टूट जाता हैज़िंदगी से लम्बी है बात रतजगे की हैरास्ते में कैसे होबात तख़लिए की हैतख़लिए की बातों में गुफ़्तुगू इज़ाफ़ी हैप्यार करने वालों को इक निगाह काफ़ी हैहो सके तो सुन जाओ एक रोज़ अकेले मेंतुम से क्या कहें जानाँ इस क़दर झमेले हैं
दूसरी बात भी झूटी है कि दिल जानता हैयाँ कोई मोड़ कोई दश्त कोई घात नहींजिस के पर्दे में मिरा माह-ए-रवाँ डूब सकेतुम से चलती रहे ये राह, यूँही अच्छा हैतुम ने मुड़ कर भी न देखा तो कोई बात नहीं
जब दुख की नदिया में हम नेजीवन की नाव डाली थीथा कितना कस-बल बाँहों मेंलोहू में कितनी लाली थीयूँ लगता था दो हाथ लगेऔर नाव पूरम पार लगीऐसा न हुआ, हर धारे मेंकुछ अन-देखी मंजधारें थींकुछ माँझी थे अंजान बहुतकुछ बे-परखी पतवारें थींअब जो भी चाहो छान करोअब जितने चाहो दोश धरोनदिया तो वही है, नाव वहीअब तुम ही कहो क्या करना हैअब कैसे पार उतरना हैजब अपनी छाती में हम नेइस देस के घाव देखे थेथा वेदों पर विश्वाश बहुतऔर याद बहुत से नुस्ख़े थेयूँ लगता था बस कुछ दिन मेंसारी बिपता कट जाएगीऔर सब घाव भर जाएँगेऐसा न हुआ कि रोग अपनेकुछ इतने ढेर पुराने थेवेद इन की टोह को पा न सकेऔर टोटके सब बे-कार गएअब जो भी चाहो छान करोअब जितने चाहो दोश धरोछाती तो वही है, घाव वहीअब तुम ही कहो क्या करना हैये घाव कैसे भरना है
अभी मरा नहीं ज़िंदा है आदमी शायदयहीं कहीं उसे ढूँडो यहीं कहीं होगाबदन की अंधी गुफा में छुपा हुआ होगाबढ़ा के हाथहर इक रौशनी को गुल कर दोहवाएँ तेज़ हैं झँडे लपेट कर रख दोजो हो सके तो उन आँखों पे पट्टियाँ कस दोन कोई पाँव की आहटन साँसों की आवाज़डरा हुआ है वोकुछ और भी न डर जाएबदन की अंधी गुफा से न कूच कर जाएयहीं कहीं उसे ढूँडोवो आज सदियों बादउदास उदास हैख़ामोश हैअकेला हैन जाने कब कोई पसली फड़क उठे उस कीयहीं कहीं उसे ढूँडो यहीं कहीं होगाबरहना हो तो उसे फिर लिबास पहना दोअँधेरी आँखों में सूरज की आग दहका दोबहुत बड़ी है ये बस्ती कहीं भी दफ़ना दोअभी मरा नहींज़िंदा है आदमी शायद
रुकी रुकी सी सफ़ें मल्गजी घटाओं कीउतार पर है सर-ए-सहन रक़्स पीपल कावो कुछ नहीं है अब इक जुम्बिश-ए-ख़फ़ी के सिवाख़ुद अपनी कैफ़ियत-ए-नील-गूँ में हर लहज़ाये शाम डूबती जाती है छुपती जाती हैहिजाब-ए-वक़्त सिरे से है बेहिस-ओ-हरकतरुकी रुकी दिल-ए-फ़ितरत की धड़कनें यक-लख़्तये रंग-ए-शाम कि गर्दिश ही आसमाँ में नहींबस एक वक़्फ़ा-ए-तारीक, लम्हा-ए-शहलासमा में जुम्बिश-ए-मुबहम सी कुछ हुई फ़ौरनतुली घटा के तले भीगे भीगे पत्तों सेहरी हरी कई चिंगारियाँ सी फूट पड़ींकि जैसे खुलती झपकती हों बे-शुमार आँखेंअजब ये आँख-मिचोली थी नूर-ओ-ज़ुल्मत कीसुहानी नर्म लवें देते अन-गिनत जुगनूघनी सियाह ख़ुनुक पत्तियों के झुरमुट सेमिसाल-ए-चादर-ए-शब-ताब जगमगाने लगेकि थरथराते हुए आँसुओं से साग़र-ए-शामछलक छलक पड़े जैसे बग़ैर सान गुमानबुतून-ए-शाम में इन ज़िंदा क़ुमक़ुमों की दमककिसी की सोई हुई याद को जगाती थीवो बे-पनाह घटा वो भरी भरी बरसातवो सीन देख के आँखें मिरी भर आती थींमिरी हयात ने देखी हैं बीस बरसातेंमिरे जनम ही के दिन मर गई थी माँ मेरीवो माँ कि शक्ल भी जिस माँ की मैं न देख सकाजो आँख भर के मुझे देख भी सकी न वो माँमैं वो पिसर हूँ जो समझा नहीं कि माँ क्या हैमुझे खिलाइयों और दाइयों ने पाला थावो मुझ से कहती थीं जब घिर के आती थी बरसातजब आसमान में हर सू घटाएँ छाती थींब-वक़्त-ए-शाम जब उड़ते थे हर तरफ़ जुगनूदिए दिखाते हैं ये भूली-भटकी रूहों कोमज़ा भी आता था मुझ को कुछ उन की बातों मेंमैं उन की बातों में रह रह के खो भी जाता थापर इस के साथ ही दिल में कसक सी होती थीकभी कभी ये कसक हूक बन के उठती थीयतीम दिल को मिरे ये ख़याल होता था!ये शाम मुझ को बना देती काश इक जुगनूतो माँ की भटकी हुई रूह को दिखाता राहकहाँ कहाँ वो बिचारी भटक रही होगीकहाँ कहाँ मिरी ख़ातिर भटक रही होगीये सोच कर मिरी हालत अजीब हो जातीपलक की ओट में जुगनू चमकने लगते थेकभी कभी तो मिरी हिचकियाँ सी बंध जातींकि माँ के पास किसी तरह मैं पहुँच जाऊँऔर उस को राह दिखाता हुआ मैं घर लाऊँदिखाऊँ अपने खिलौने दिखाऊँ अपनी किताबकहूँ कि पढ़ के सुना तो मिरी किताब मुझेफिर इस के ब'अद दिखाऊँ उसे मैं वो कापीकि टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनी थीं कुछ जिस मेंये हर्फ़ थे जिन्हें मैं ने लिक्खा था पहले-पहलऔर उस को राह दिखाता हुआ मैं घर लाऊँदिखाऊँ फिर उसे आँगन में वो गुलाब की बेलसुना है जिस को उसी ने कभी लगाया थाये जब कि बात है जब मेरी उम्र ही क्या थीनज़र से गुज़री थीं कल चार पाँच बरसातें
जलाल-ए-आतिश-ओ-बर्क़-ओ-सहाब पैदा करअजल भी काँप उठे वो शबाब पैदा करतिरे ख़िराम में है ज़लज़लों का राज़ निहाँहर एक गाम पर इक इंक़लाब पैदा करसदा-ए-तीशा-ए-मज़दूर है तिरा नग़्मातू संग-ओ-ख़िश्त से चंग-ओ-रुबाब पैदा करबहुत लतीफ़ है ऐ दोस्त तेग़ का बोसायही है जान-ए-जहाँ इस में आब पैदा करतिरे क़दम पे नज़र आए महफ़िल-ए-अंजुमवो बाँकपन वो अछूता शबाब पैदा करतिरा शबाब अमानत है सारी दुनिया कीतू ख़ार-ज़ार-ए-जहाँ में गुलाब पैदा करसुकून-ए-ख़ाब है बे-दस्त-ओ-पा ज़ईफ़ी कातू इज़्तिराब है ख़ुद इज़्तिराब पैदा करन देख ज़ोहद की तू इस्मत-ए-गुनह-आलूदगुनह में फ़ितरत-ए-इस्मत-मआब पैदा करतिरे जिलौ में नई जन्नतें नए दोज़ख़नई जज़ाएँ अनोखे अज़ाब पैदा करशराब खींची है सब ने ग़रीब के ख़ूँ सेतू अब अमीर के ख़ूँ से शराब पैदा करगिरा दे क़स्र-ए-तमद्दुन कि इक फ़रेब है येउठा दे रस्म-ए-मोहब्बत अज़ाब पैदा करजो हो सके हमें पामाल कर के आगे बढ़जो हो सके तो हमारा जवाब पैदा करबहे ज़मीं पे जो मेरा लहू तो ग़म मत करइसी ज़मीं से महकते गुलाब पैदा करतू इंक़लाब की आमद का इंतिज़ार न करजो हो सके तो अभी इंक़लाब पैदा कर
जहाँ-ज़ादवो हल्ब की कारवाँ-सरा का हौज़, रात वो सुकूतजिस में एक दूसरे से हम-किनार तैरते रहेमुहीत जिस तरह हो दाएरे के गिर्द हल्क़ा-ज़नतमाम रात तैरते रहे थे हमहम एक दूसरे के जिस्म ओ जाँ से लग केतैरते रहे थे एक शाद-काम ख़ौफ़ सेकि जैसे पानी आँसुओं में तैरता रहेहम एक दूसरे से मुतमइन ज़वाल-ए-उम्र के ख़िलाफ़तैरते रहेतू कह उठी 'हसन यहाँ भी खींच लाईजाँ की तिश्नगी तुझे!'(लो अपनी जाँ की तिश्नगी को याद कर रहा था मैंकि मेरा हल्क़ आँसुओं की बे-बहा सख़ावतोंसे शाद-काम हो गया!)मगर ये वहम दिल में तैरने लगा कि हो न होमिरा बदन कहीं हलब के हौज़ ही में रह गयानहीं, मुझे दुई का वाहिमा नहींकि अब भी रब्त-ए-जिस्म-ओ-जाँ का ए'तिबार है मुझेयही वो ए'तिबार थाकि जिस ने मुझ को आप में समो दियामैं सब से पहले 'आप' हूँअगर हमीं हों तू हो और मैं हूँ फिर भी मैंहर एक शय से पहले आप हों!अगर मैं ज़िंदा हूँ तो कैसे आप से दग़ा करूँ?कि तेरे जैसी औरतें, जहाँ-ज़ाद,ऐसी उलझनें हैंजिन को आज तक कोई नहीं 'सुलझ' सकाजो मैं कहूँ के मैं 'सुलझ' सका तो सर-ब-सरफ़रेब अपने आप से!कि औरतों की साख़्त है वो तंज़ अपने-आप परजवाब जिस का हम नहीं(लबीब कौन है? तमाम रात जिस का ज़िक्रतेरे लब पे थावो कौन तेरे गेसुओं को खींचता रहालबों को नोचता रहाजो मैं कभी न कर सकानहीं ये सच है मैं हूँ या लबीब होरक़ीब हो तो किस लिए तिरी ख़ुद-आगही की बे-रिया नशात-ऐ-नाब काजो सद-नवा ओ यक-नवा खिराम-ऐ-सुब्ह की तरहलबीब हर नवा-ऐ-साज़-गार की नफ़ी सही!)मगर हमारा राब्ता विसाल-ए-आब-ओ-गिल नहीं, न था कभीवजूद-ए-आदमी से आब-ओ-गिल सदा बरूँ रहेन हर विसाल-ए-आब-ओ-गिल से कोई जाम या सुबू ही बन सकाजो इन का एक वाहिमा ही बन सके तो बन सके!
हों जो अल्फ़ाज़ के हाथों में हैं संग-ए-दुश्नामतंज़ छलकाए तो छलकाया करे ज़हर के जामतीखी नज़रें हों तुर्श अबरू-ए-ख़मदार रहेंबन पड़े जैसे भी दिल सीनों में बेदार रहेंबेबसी हर्फ़ को ज़ंजीर-ब-पा कर न सकेकोई क़ातिल हो मगर क़त्ल-ए-नवा कर न सके
धरती की सुलगती छाती से बेचैन शरारे पूछते हैंतुम लोग जिन्हें अपना न सके वो ख़ून के धारे पूछते हैंसड़कों की ज़बाँ चिल्लाती है सागर के किनारे पूछते हैंये किस का लहू है कौन मरा ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-क़ौम बताये जलते हुए घर किस के हैं ये कटते हुए तन किस के हैंतक़्सीम के अंदर तूफ़ाँ में लुटते हुए गुलशन किस के हैंबद-बख़्त फ़ज़ाएँ किस की हैं बर्बाद नशेमन किस के हैंकुछ हम भी सुनें हम को भी सुनाकिस काम के हैं ये दीन-धर्म जो शर्म का दामन चाक करेंकिस तरह के हैं ये देश-भगत जो बस्ते घरों को ख़ाक करेंये रूहें कैसी रूहें हैं जो धरती को नापाक करेंआँखें तो उठा नज़रें तो मिलाजिस राम के नाम पे ख़ून बहे उस राम की 'इज़्ज़त क्या होगीजिस दीन के हाथों लाज लुटे इस दीन की क़ीमत क्या होगीइंसान की इस ज़िल्लत से परे शैतान की ज़िल्लत क्या होगीये वेद हटा क़ुरआन उठाये किस का लहू है कौन मिराऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-क़ौम बता
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदमबहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन काइसी ज़मीन पे खेला है 'राम' का बचपनइसी ज़मीन पे उन नन्हे नन्हे हाथों नेकिसी समय में धनुष-बान को सँभाला थाइसी दयार ने देखी है 'कृष्ण' की लीलायहीं घरोंदों में सीता सुलोचना राधाकिसी ज़माने में गुड़ियों से खेलती होंगीयही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँदयही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़हयहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूसहुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारेइन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' कासुना है 'भर्तृहरि' भी इन्हीं से खेला था'भरत' 'अगस्त्य' 'कपिल' 'व्यास' 'पाशी' 'कौटिल्य''जनक' 'वशिष्ठ' 'मनु' 'वाल्मीकि' 'विश्वामित्र''कणाद' 'गौतम' ओ 'रामानुज' 'कुमारिल-भट्ट'मोहनजोडारो हड़प्पा के और अजंता केबनाने वाले यहीं बल्लमों से खेले थेइसी हिंडोले में 'भवभूति' ओ 'कालीदास' कभीहुमक हुमक के जो तुतला के गुनगुनाए थेसरस्वती ने ज़बानों को उन की चूमा थायहीं के चाँद व सूरज खिलौने थे उन केइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' काइसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर''रहीम' 'नानक' ओ 'चैतन्य' और 'चिश्ती' नेइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन के दिन गुज़ारे थेइसी ज़मीं पे कभी शाहज़ादा-ए-'ख़ुर्रम'ज़रा सी दिल-शिकनी पर जो रो दिया होगाभर आया था दिल-ए-नाज़ुक तो क्या अजब इस मेंइन आँसुओं में झलक ताज की भी देखी हो'अहिल्याबाई' 'दमन' 'पदमिनी' ओ 'रज़िया' नेयहीं के पेड़ों की शाख़ों में डाले थे झूलेइसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन कीइन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थेइसी ज़मीन पे घुटनों के बल चले होंगे'मलिक-मोहम्मद' ओ 'रसखान' और 'तुलसी-दास'इन्हीं फ़ज़ाओं में गूँजी थी तोतली बोली'कबीर-दास' 'टुकाराम' 'सूर' ओ 'मीरा' कीइसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुलाइसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भीठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'यहीं की ख़ाक से उभरे थे 'प्रेमचंद' ओ 'टैगोर'यहीं से उठ्ठे थे तहज़ीब-ए-हिन्द के मेमारइसी ज़मीन ने देखा था बाल-पन इन कायहीं दिखाई थीं इन सब ने बाल-लीलाएँयहीं हर एक के बचपन ने तर्बियत पाईयहीं हर एक के जीवन का बालकांड खुलायहीं से उठते बगूलों के साथ दौड़े हैंयहीं की मस्त घटाओं के साथ झूमे हैंयहीं की मध-भरी बरसात में नहाए हैंलिपट के कीचड़ ओ पानी से बचपने उन केइसी ज़मीन से उठ्ठे वो देश के सावंतउड़ा दिया था जिन्हें कंपनी ने तोपों सेइसी ज़मीन से उठी हैं अन-गिनत नस्लेंपले हैं हिन्द हिंडोले में अन-गिनत बच्चेमुझ ऐसे कितने ही गुमनाम बच्चे खेले हैंइसी ज़मीं से इसी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुएज़मीन-ए-हिन्द अब आराम-गाह है उन कीइस अर्ज़-ए-पाक से उट्ठीं बहुत सी तहज़ीबेंयहीं तुलू हुईं और यहीं ग़ुरूब हुईंइसी ज़मीन से उभरे कई उलूम-ओ-फ़ुनूनफ़राज़-ए-कोह-ए-हिमाला ये दौर-ए-गंग-ओ-जमनऔर इन की गोद में पर्वर्दा कारवानों नेयहीं रुमूज़-ए-ख़िराम-ए-सुकूँ-नुमा सीखेनसीम-ए-सुब्ह-ए-तमद्दुन ने भैरवीं छेड़ीयहीं वतन के तरानों की वो पवें फूटेंवो बे-क़रार सुकूँ-ज़ा तरन्नुम-ए-सहरीवो कपकपाते हुए सोज़-ओ-साज़ के शोलेइन्ही फ़ज़ाओं में अंगड़ाइयाँ जो ले के उठेलवों से जिन के चराग़ाँ हुई थी बज़्म-ए-हयातजिन्हों ने हिन्द की तहज़ीब को ज़माना हुआबहुत से ज़ावियों से आईना दिखाया थाइसी ज़मीं पे ढली है मिरी हयात की शामइसी ज़मीन पे वो सुब्ह मुस्कुराई हैतमाम शोला ओ शबनम मिरी हयात की सुब्हसुनाऊँ आज कहानी मैं अपने बचपन कीदिल-ओ-दिमाग़ की कलियाँ अभी न चटकी थींहमेशा खेलता रहता था भाई बहनों मेंहमारे साथ मोहल्ले की लड़कियाँ लड़केमचाए रखते थे बालक उधम हर एक घड़ीलहू तरंग उछल-फाँद का ये आलम थामोहल्ला सर पे उठाए फिरे जिधर गुज़रेहमारे चहचहे और शोर गूँजते रहतेचहार-सम्त मोहल्ले के गोशे गोशे मेंफ़ज़ा में आज भी ला-रैब गूँजते होंगेअगरचे दूसरे बच्चों की तरह था मैं भीब-ज़ाहिर औरों के बचपन सा था मिरा बचपनये सब सही मिरे बचपन की शख़्सियत भी थी एकवो शख़्सियत कि बहुत शोख़ जिस के थे ख़द-ओ-ख़ालअदा अदा में कोई शान-ए-इन्फ़िरादी थीग़रज़ कुछ और ही लक्षण थे मेरे बचपन केमुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगावहर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँदिल उमडा आता था ऐसा कि जी ये चाहता थाउठा के रख लूँ कलेजे में अपनी दुनिया कोमुझे है याद अभी तक कि खेल-कूद में भीकुछ ऐसे वक़्फ़े पुर-असरार आ ही जाते थेकि जिन में सोचने लगता था कुछ मिरा बचपनकई मआनी-ए-बे-लफ़्ज़ छूने लगते थेबुतून-ए-ग़ैब से मेरे शुऊर-ए-असग़र कोहर एक मंज़र-ए-मानूस घर का हर गोशाकिसी तरह की हो घर में सजी हुई हर चीज़मिरे मोहल्ले की गलियाँ मकाँ दर-ओ-दीवारचबूतरे कुएँ कुछ पेड़ झाड़ियाँ बेलेंवो फेरी वाले कई उन के भाँत भाँत के बोलवो जाने बूझे मनाज़िर वो आसमाँ ओ ज़मींबदलते वक़्त का आईना गर्मी-ओ-ख़ुनकीग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादूशफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ सेजवाहरों की चटानें सी कुछ पिघलती हुईंशजर हजर की वो कुछ सोचती हुई दुनियासुहानी रात की मानूस रमज़ियत का फ़ुसूँअलस्सबाह उफ़ुक़ की वो थरथराती भवेंकिसी का झाँकना आहिस्ता फूटती पौ सेवो दोपहर का समय दर्जा-ए-तपिश का चढ़ावथकी थकी सी फ़ज़ा में वो ज़िंदगी का उतारहुआ की बंसियाँ बंसवाड़ियों में बजती हुईंवो दिन के बढ़ते हुए साए सह-पहर का सुकूँसुकूत शाम का जब दोनों वक़्त मिलते हैंग़रज़ झलकते हुए सरसरी मनाज़िर परमुझे गुमान परिस्तानियत का होता थाहर एक चीज़ की वो ख़्वाब-नाक अस्लिय्यतमिरे शुऊर की चिलमन से झाँकता था कोईलिए रुबूबियत-ए-काएनात का एहसासहर एक जल्वे में ग़ैब ओ शुहूद का वो मिलापहर इक नज़ारा इक आईना-ख़ाना-ए-हैरतहर एक मंज़र-ए-मानूस एक हैरत-ज़ारकहीं रहूँ कहीं खेलों कहीं पढ़ूँ लिखूँमिरे शुऊर पे मंडलाते थे मनाज़िर-ए-दहरमैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता थावफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नममुझे यक़ीन है इन उन्सुरी मनाज़िर सेकि आम बच्चों से लेता था मैं ज़ियादा असरकिसी समय मिरी तिफ़्ली रही न बे-परवान छू सकी मिरी तिफ़्ली को ग़फ़लत-ए-तिफ़्लीये खेल-कूद के लम्हों में होता था एहसासदुआएँ देता हो जैसे मुझे सुकूत-ए-दवामकि जैसे हाथ अबद रख दे दोश-ए-तिफ़्ली परहर एक लम्हा के रख़नों से झाँकती सदियाँकहानियाँ जो सुनूँ उन में डूब जाता थाकि आदमी के लिए आदमी की जग-बीतीसे बढ़ के कौन सी शय और हो ही सकती हैइन्ही फ़सानों में पिन्हाँ थे ज़िंदगी के रुमूज़इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयातउन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रेंरुमूज़-ए-बेश-बहा ठेठ आदमियत केकहानियाँ थीं कि सद-दर्स-गाह-ए-रिक़्क़त-ए-क़ल्बहर इक कहानी में शाइस्तगी-ए-ग़म का सबक़वो उंसुर आँसुओं का दास्तान-ए-इंसाँ मेंवो नल-दमन की कथा सरगुज़श्त-ए-सावित्री'शकुन्तला' की कहानी 'भरत' की क़ुर्बानीवो मर्ग-ए-भीष्म-पितामह वो सेज तीरों कीवो पांचों पांडव की स्वर्ग-यात्रा की कथावतन से रुख़्सत-ए-'सिद्धार्थ' 'राम' का बन-बासवफ़ा के ब'अद भी 'सीता' की वो जिला-वतनीवो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुएबला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जानावो अंधकार वो बारिश, बढ़ी हुई जमुनाग़म-ए-आफ़रीन कहानी वो 'हीर' 'राँझा' कीशुऊर-ए-हिन्द के बचपन की यादगार-ए-अज़ीमकि ऐसे वैसे तख़य्युल की साँस उखड़ जाएकई मुहय्युर-ए-इदराक देव-मालाएँहितोपदेश के क़िस्से कथा सरत-सागरकरोड़ों सीनों में वो गूँजता हुआ आल्हामैं पूछता हूँ किसी और मलक वालों सेकहानियों की ये दौलत ये बे-बहा दौलतफ़साने देख लो इन के नज़र भी आती हैमैं पूछता हूँ कि गहवारे और क़ौमों केबसे हुए हैं कहीं ऐसी दास्तानों सेकहानियाँ जो मैं सुनता था अपने बचपन मेंमिरे लिए वो न थीं महज़ बाइस-ए-तफ़रीहफ़सानों से मिरे बचपन ने सोचना सीखाफ़सानों से मुझे संजीदगी के दर्स मिलेफ़सानों में नज़र आती थी मुझ को ये दुनियाग़म ओ ख़ुशी में रची प्यार में बसाई हुईफ़सानों से मिरे दिल ने घुलावटें पाईंयही नहीं कि मशाहीर ही के अफ़्सानेज़रा सी उम्र में करते हों मुझ को मुतअस्सिरमोहल्ले टोले के गुमनाम आदमिय्यों केकुछ ऐसे सुनने में आते थे वाक़िआत-ए-हयातजों यूँ तो होते थे फ़र्सूदा और मामूलीमगर थे आईने इख़्लास और शराफ़त केये चंद आई गई बातें ऐसी बातें थींकि जिन की ओट चमकता था दर्द-ए-इंसानीये वारदात नहीं रज़्मिय्ये हयात के थेग़रज़ कि ये हैं मिरे बचपने की तस्वीरेंनदीम और भी कुछ ख़त्त-ओ-ख़ाल हैं उन केये मेरी माँ का है कहना कि जब मैं बच्चा थामैं ऐसे आदमी की गोद में न जाता थाजो बद-क़िमार हो एेबी हो या हो बद-सूरतमुझे भी याद है नौ दस बरस ही का मैं थातो मुझ पे करता था जादू सा हुस्न-ए-इंसानीकुछ ऐसा होता था महसूस जब मैं देखता थाशगुफ़्ता रंग तर-ओ-ताज़ा रूप वालों काकि उन की आँच मिरी हड्डियाँ गला देगीइक आज़माइश-ए-जाँ थी कि था शुऊर-ए-जमालऔर उस की नश्तरिय्यत उस की उस्तुखाँ-सोज़ीग़म ओ नशात लगावट मोहब्बत ओ नफ़रतइक इंतिशार-ए-सकूँ इज़्तिराब प्यार इताबवो बे-पनाह ज़की-उल-हिसी वो हिल्म ओ ग़ुरूरकभी कभी वो भरे घर में हिस्स-ए-तंहाईवो वहशतें मिरी माहौल-ए-ख़ुश-गवार में भीमिरी सरिश्त में ज़िद्दैन के कई जोड़ेशुरूअ ही से थे मौजूद आब-ओ-ताब के साथमिरे मिज़ाज में पिन्हाँ थी एक जदलिय्यतरगों में छूटते रहते थे बे-शुमार अनारनदीम ये हैं मिरे बाल-पन के कुछ आसारवफ़ूर ओ शिद्दत-ए-जज़्बात का ये आलम थाकि कौंदे जस्त करें दिल के आबगीने मेंवो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल होवो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाएनदीम ज़िक्र-ए-जवानी से काँप जाता हूँजवानी आई दबे पाँव और यूँ आईकि उस के आते ही बिगड़ा बना-बनाया खेलवो ख़्वाहिशात के जज़्बात के उमडते हुएवो होंकते हुए बे-नाम आग के तूफ़ाँवो फूटता हुआ ज्वाला-मुखी जवानी कारगों में उठती हुई आँधियों के वो झटकेकि जो तवाज़ुन-ए-हस्ती झिंझोड़ के रख देंवो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँबुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमाऔर ऐसे में मुझे ब्याहा गया भला किस सेजो हो न सकती थी हरगिज़ मिरी शरीक-ए-हयातहम एक दूसरे के वास्ते बने ही न थेसियाह हो गई दुनिया मिरी निगाहों मेंवो जिस को कहते हैं शादी-ए-ख़ाना-आबादीमिरे लिए वो बनी बेवगी जवानी कीलुटा सुहाग मिरी ज़िंदगी का मांडो मेंनदीम खा गई मुझ को नज़र जवानी कीबला-ए-जान मुझे हो गया शुऊर-ए-जमालतलाश-ए-शोला-ए-उलफ़त से ये हुआ हासिलकि नफ़रतों का अगन-कुंड बन गई हस्तीवो हल्क़ ओ सीना ओ रग रग में बे-पनाह चुभानदीम जैसे निगल ली हो मैं ने नाग-फनीज़ इश्क़-ज़ादम ओ इशक़म कमुश्त ज़ार-ओ-दरेग़ख़बर न बुर्द ब-रुस्तम कसे कि सोहरा-बमन पूछ आलम-ए-काम-ओ-दहन नदीम मिरेसमर हयात का जब राख बिन गया मुँह मेंमैं चलती-फिरती चिता बन गया जवानी कीमैं कांधा देता रहा अपने जीते मुर्दे कोये सोचता था कि अब क्या करूँ कहाँ जाऊँबहुत से और मसाइब भी मुझ पे टूट पड़ेमैं ढूँढने लगा हर सम्त सच्ची झूटी पनाहतलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती मेंरुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी हैनए सिरे से समझना पड़ा है दुनिया कोबड़े जतन से सँभाला है ख़ुद को मैं ने नदीममुझे सँभलने में तो चालीस साल गुज़रे हैंमेरी हयात तो विश-पान की कथा है नदीममैं ज़हर पी के ज़माने को दे सका अमृतन पूछ मैं ने जो ज़हराबा-ए-हयात पियामगर हूँ दिल से मैं इस के लिए सिपास-गुज़ारलरज़ते हाथों से दामन ख़ुलूस का न छटाबचा के रक्खी थी मैं ने अमानत-ए-तिफ़्लीइसे न छीन सकी मुझ से दस्त-बुर्द-ए-शबाबब-क़ौल शाएर-ए-मुल्क-ए-फ़रंग हर बच्चाख़ुद अपने अहद-ए-जवानी का बाप होता हैये कम नहीं है कि तिफ़्ली-ए-रफ़्ता छोड़ गईदिल-ए-हज़ीं में कई छोटे छोटे नक़्श-ए-क़दममिरी अना की रगों में पड़े हुए हैं अभीन जाने कितने बहुत नर्म उँगलियों के निशाँहनूज़ वक़्त के बे-दर्द हाथ कर न सकेहयात-ए-रफ़्ता की ज़िंदा निशानियों को फ़नाज़माना छीन सकेगा न मेरी फ़ितरत सेमिरी सफ़ा मिरे तहतुश-शुऊर की इस्मततख़य्युलात की दोशीज़गी का रद्द-ए-अमलजवान हो के भी बे-लौस तिफ़ल-वश जज़्बातस्याना होने पे भी ये जिबिल्लतें मेरीये सरख़ुशी ओ ग़म बे-रिया ये क़ल्ब-गुदाज़बग़ैर बैर के अन-बन ग़रज़ से पाक तपाकग़रज़ से पाक ये आँसू ग़रज़ से पाक हँसीये दश्त-ए-दहर में हमदर्दियों का सरचश्माक़ुबूलियत का ये जज़्बा ये काएनात ओ हयातइस अर्ज़-ए-पाक पर ईमान ये हम-आहंगीहर आदमी से हर इक ख़्वाब ओ ज़ीस्त से ये लगावये माँ की गोद का एहसास सब मनाज़िर मेंक़रीब ओ दूर ज़मीं में ये बू-ए-वतनिय्यतनिज़ाम-ए-शमस-ओ-क़मर में पयाम-ए-हिफ़्ज़-ए-हयातब-चश्म-ए-शाम-ओ-सहर मामता की शबनम सीये साज़ ओ दिल में मिरे नग़्मा-ए-अनलकौनैनहर इज़्तिराब में रूह-ए-सुकून-ए-बे-पायाँज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगमये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुईकिसी की याद की शहनाइयाँ सी बजती हुईये रमज़ीत के अनासिर शुऊर-ए-पुख़्ता मेंफ़लक पे वज्द में लाती है जो फ़रिश्तों कोवो शाएरी भी बुलूग़-ए-मिज़ाज-ए-तिफ़्ली हैये नश्तरिय्यत-ए-हस्ती ये इस की शेरियतये पत्ती पत्ती पे गुलज़ार-ए-ज़िंदगी के किसीलतीफ़ नूर की परछाइयाँ सी पड़ती हुईबहम ये हैरत ओ मानूसियत की सरगोशीबशर की ज़ात कि महर-ए-उलूहियत ब-जबींअबद के दिल में जड़ें मारता हुआ सब्ज़ाग़म-ए-जहाँ मुझे आँखें दिखा नहीं सकताकि आँखें देखे हुए हूँ मैं ने अपने बचपन कीमिरे लहू में अभी तक सुनाई देती हैंसुकूत-ए-हुज़्न में भी घुंघरुओं की झंकारेंये और बात कि मैं इस पे कान दे न सकूँइसी वदीअत-ए-तिफ़्ली का अब सहारा हैयही हैं मर्हम-ए-काफ़ूर दिल के ज़ख़्मों परउन्ही को रखना है महफ़ूज़ ता-दम-ए-आख़िरज़मीन-ए-हिन्द है गहवारा आज भी हमदमअगर हिसाब करें दस करोड़ बच्चों काये बच्चे हिन्द की सब से बड़ी अमानत हैंहर एक बच्चे में हैं सद-जहान-ए-इम्कानातमगर वतन का हल-ओ-अक़्द जिन के हाथ में हैनिज़ाम-ए-ज़िंदगी-ए-हिंद जिन के बस में हैरवय्या देख के उन का ये कहना पड़ता हैकिसे पड़ी है कि समझे वो इस अमानत कोकिसे पड़ी है कि बच्चों की ज़िंदगी को बचाएख़राब होने से टलने से सूख जाने सेबचाए कौन इन आज़ुर्दा होनहारों कोवो ज़िंदगी जिसे ये दे रहे हैं भारत कोकरोड़ों बच्चों के मिटने का इक अलमिय्या हैचुराए जाते हैं बच्चे अभी घरों से यहाँकि जिस्म तोड़ दिए जाएँ उन के ताकि मिलेचुराने वालों को ख़ैरात माघ-मेले कीजो इस अज़ाब से बच जाएँ तो गले पड़ जाएँवो लानतें कि हमारे करोड़ों बच्चों कीनदीम ख़ैर से मिट्टी ख़राब हो जाएवो मुफ़्लिसी कि ख़ुशी छीन ले वो बे-बरगीउदासियों से भरी ज़िंदगी की बे-रंगीवो यासियात न जिस को छुए शुआ-ए-उमीदवो आँखें देखती हैं हर तरफ़ जो बे-नूरीवो टुकटुकी कि जो पथरा के रह गई हो नदीमवो बे-दिली की हँसी छीन ले जो होंटों सेवो दुख कि जिस से सितारों की आँख भर आएवो गंदगी वो कसाफ़त मरज़-ज़दा पैकरवो बच्चे छिन गए हों जिन से बचपने उन केहमीं ने घोंट दिया जिस के बचपने का गलाजो खाते-पीते घरों के हैं बच्चे उन को भी क्यासमाज फूलने-फलने के दे सका साधनवो साँस लेते हैं तहज़ीब-कुश फ़ज़ाओं मेंहम उन को देते हैं बे-जान और ग़लत तालीममिलेगा इल्म-ए-जिहालत-नुमा से क्या उन कोनिकल के मदरसों और यूनीवर्सिटिय्यों सेये बद-नसीब न घर के न घाट के होंगेमैं पूछता हूँ ये तालीम है कि मक्कारीकरोड़ों ज़िंदगियों से ये बे-पनाह दग़ानिसाब ऐसा कि मेहनत करें अगर इस परबजाए इल्म जहालत का इकतिसाब करेंये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीमदिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानीहर इक तरह की ग़िज़ा में यहाँ मिलावट हैवो जिस को बच्चों की तालीम कह के देते हैंवो दर्स उल्टी छुरी है गले पे बचपन केज़मीन-ए-हिन्द हिण्डोला नहीं है बच्चों काकरोड़ों बच्चों का ये देस अब जनाज़ा हैहम इंक़लाब के ख़तरों से ख़ूब वाक़िफ़ हैंकुछ और रोज़ यही रह गए जो लैल-ओ-नहारतो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भीकि बच्चे क़ौम की सब से बड़ी अमानत हैं
अक्सर ऐसा हुआशहर-दर-शहरऔर बस्ती बस्तीकिसी भी दरीचे मेंकोई चराग़-ए-मोहब्बत न थाबे-रुख़ी से भरीसारी गलियों मेंसारे मकानों केदरवाज़े यूँ बंद थेजैसे इक सर्दख़ामोश लहजे मेंवो कह रहे होंमुरव्वत का और मेहरबानी का मस्कनकहीं और होगायहाँ तो नहीं हैयही एक मंज़र समेटे थेशहरों के पथरीले सब रास्तेजाने किस वास्तेआरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे
हुए यसरिब की सम्त जब राहीसय्यद-ए-अबतही के हमराहीरिश्ते उल्फ़त के सारे तोड़ चलेऔर बिल्कुल वतन को छोड़ चलेगो वतन से चले थे हो के ख़फ़ापर वतन में था सब का जी अटकादिल-लगी के बहुत मिले सामानपर न भूले वतन के रेगिस्तानदिल में आठों पहर खटकते थेसंग-रेज़े ज़मीन-ए-बतहा केघर जफ़ाओं से जिन की छूटा थादिल से रिश्ता न उन का टूटा था
ख़ुलूस के ऐसे दिए जलाएँबुझा सके न जिन को मुख़ालिफ़ हवाएँसदा गूँजे मंदिर की घंटियाँबराबर अज़ानें भी आएँसारी नफ़रतें बह जाएँगंगा घाट पर अगर मन भी नहलाएँनफ़रत कुदूरत से दिल साफ़ हो तोहाथों के साथ दिल भी मिलाएँगवाह बना के गंगा की लहरों कोसच्ची चाहत का वा'दा करेंऔर फिर वो वा'दे निभाएँजुस्तुजू है अब मोहब्बत की उल्फ़त की सब कोदिल की बातें सब को बताएँ
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