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नज़्म
आख़िरी तकरार के बाद मैं ने ज़बान समेट ली है
अब मैं एक लफ़्ज़ भी मज़ीद नहीं बोलूँगा
अम्मार इक़बाल
नज़्म
दफ़्न कर देगा जो ख़ालिक़ को भी मख़्लूक़ समेत
और ये आबादियाँ बन जाएँगी फिर रेत ही रेत
अहमद फ़राज़
नज़्म
समेट लूँ उन्हें तो फिर वो काएनात को जगाएँ
अभी तो रूह बन के ज़र्रे ज़र्रे में समाऊँगा
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
अबू-लहब अजनबी ज़मीनों के लाल ओ गौहर समेट कर
फिर वतन को लौटा हज़ार तर्रार ओ तेज़ आँखें पुराने