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नज़्म
कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का सुराग़
न सर्फ़-ए-ख़िदमत-ए-शाहाँ कि ख़ूँ-बहा देते
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
‘मीर-मुश्ताक़' की मर्दाना-रवी याद आई
ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ का इक 'अज़्म-ए-जवाँ याद आया