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नज़्म
उस शाम मुझे मालूम हुआ जब भाई जंग में काम आएँ
सरमाए के क़हबा-ख़ाने में बहनों की जवानी बिकती है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
सरमाए के हाथों लोगों की किस तरह मोहब्बत धूल हुई
सदियों से बराबर मेहनत-कश हालात से लड़ते आए हैं
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
बाज़ ऐसे थे जो सरमाए के ठेकेदार थे
कहते थे मज़दूर को ख़र और ख़ुद ख़र-कार थे