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नज़्म
तुम्हारी जो हमासा है भला उस का तो क्या कहना
है शायद मुझ को सारी उम्र उस के सेहर में रहना
जौन एलिया
नज़्म
नून मीम राशिद
नज़्म
जिस ने आफ़ाक़ पे फैलाया है यूँ सेहर का दाम
दामन-ए-वक़्त से पैवस्त है यूँ दामन-ए-शाम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
काटती है सेहर-ए-सुल्तानी को जब मूसा की ज़र्ब
सतवत-ए-फ़िरऔन हो जाती है अज़ ख़ुद ग़र्क़-ए-आब
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
तेरे ही नग़्मों से धूमें महफ़िल-ए-नाहीद में
मुझ को तेरे सेहर-ए-मौसीक़ी से कब इंकार है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ये लम्हा जिस के सेहर में खोए हुए हैं हम
कितनी मसर्रतों का सुरूर इस के ग़म में है
हिमायत अली शाएर
नज़्म
सुब्ह का सेहर है क्या, रात का जादू क्या है
और क्या चीज़ है आवाज़-ए-सबा जानता हूँ
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
जो आने वाले लम्हों की बाबत सोचती जाती है
सोचते सोचते उस की आँखें हो जाएँगी सेहर-ज़दा
साक़ी फ़ारुक़ी
नज़्म
सेहर ओ एजाज़ लिए जुम्बिश-ए-मिज़्गान-ए-दराज़
ख़ंदा-ए-शोख़ जमाल-ए-दुर-ए-ख़ुश-आब लिए