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नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
काटती है सेहर-ए-सुल्तानी को जब मूसा की ज़र्ब
सतवत-ए-फ़िरऔन हो जाती है अज़ ख़ुद ग़र्क़-ए-आब
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
तेरे ही नग़्मों से धूमें महफ़िल-ए-नाहीद में
मुझ को तेरे सेहर-ए-मौसीक़ी से कब इंकार है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
रेस्तोराँ में सजे हुए हैं कैसे कैसे चेहरे
क़ब्रों के कत्बों पर जैसे मसले मसले सहरे
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
सेहर-ए-मौसीक़ी हुआ फिर गूँज उठे गोकुल के बन
रक़्स फ़रमाने लगी फिर वादी-ए-गंग-ओ-जमन
अर्श मलसियानी
नज़्म
गो कि हँसने को ये हँसते हैं मगर शाद नहीं
फूल सेहरे के गिरफ़्तार हैं आज़ाद नहीं