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नज़्म
वो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंद
तेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आदमी क्या हैं फ़रिश्ते भी जिन्हें सज्दा करें
इन दिनों रक़्सिंदा वो सर्व-ए-रवाँ देहली में हैं