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नज़्म
और मैं ताक़-ए-त'अल्लुक़ में रखा शाम-ए-चराग़
इसी उम्मीद में साँसों से जुड़ा हूँ कि ये लौ
नदीम नाजिद
नज़्म
वो पहली शब-ए-मह शब-ए-माह-ए-दो-नीम बन जाएगी
जिस तरह साज़-कोहना के तार-ए-शिकस्ता के दोनों सिरे