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नज़्म
इक मुसव्विर का हसीं ख़्वाब है 'ग़ालिब' की ग़ज़ल
इक दरख़्शाँ शब-ए-महताब है 'ग़ालिब' की ग़ज़ल
मोहम्मद अब्दुल क़ादिर अदीब
नज़्म
दिन में तू इक शब-ए-महताब है मेरी ख़ातिर
सर्द रातों में मिरे वास्ते ख़ुर्शीद है तू
हिमायत अली शाएर
नज़्म
जब भी महताब-ए-ज़र-अफ़्शाँ के हो चेहरे पे नक़ाब
जान हम रख के हथेली पर उलट देते हैं