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नज़्म
उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकले
सितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकले
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हवस-कारी है जुर्म-ए-ख़ुद-कुशी मेरी शरीअ'त में
ये हद्द-ए-आख़िरी है मैं यहाँ तक जा नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
शौकत-ए-संजर-ओ-सलीम तेरे जलाल की नुमूद!
फ़क़्र-ए-'जुनेद'-ओ-'बायज़ीद' तेरा जमाल बे-नक़ाब!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जबीं पर साया-गुस्तर परतव-ए-क़िंदील-ए-रहबानी
अज़ार-ए-नर्म-ओ-नाज़ुक पर शफ़क़ की रंग-अफ़्शानी
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
कहते थे कि पिन्हाँ है तसव्वुफ़ में शरीअत
जिस तरह कि अल्फ़ाज़ में मुज़्मर हों मआनी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तुझ से शफ़क़त भी मिली तुझ से मोहब्बत भी मिली
दौलत-ए-इल्म मिली मुझ को शराफ़त भी मिली