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नज़्म
शिद्दत-ए-इफ़्लास से जब ज़िंदगी थी तुझ पे तंग
इश्तिहा के साथ थी जब ग़ैरत ओ इस्मत की जंग
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
वतन का नक्बत ओ अफ़्लास खो दें हम इशारे में
जहाँ ठोकर लगा दें हो वहीं से कान-ए-ज़र पैदा
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
हयात मर्ग-ए-मोहब्बत पे नौहा-ख़्वाँ है अभी
वही फ़साना-ए-इफ़्लास जाँ-सिताँ है अभी
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
जाम-ओ-मीना में बहकते हुए ईमान को देख
भूक-ओ-इफ़्लास से मरते हुए इंसान को देख