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नज़्म
जब्र-ए-बे-रंगी का ख़म्याज़ा मुक़द्दर है
अगर यूँ अपने हाथों से लगाई मेहँदियों के रंग उड़ जाएँ
किश्वर नाहीद
नज़्म
शराब-ए-बे-ख़ुदी से ता-फ़लक परवाज़ है मेरी
शिकस्त-ए-रंग से सीखा है मैं ने बन के बू रहना
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मैं ने देखा है शिकस्त-ए-साज़-ए-उल्फ़त का समाँ
अब किसी तहरीक पर बरबत उठा सकता नहीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
शिकस्त-ए-मजलिस-ओ-ज़िन्दाँ का वक़्त आ पहुँचा
वो तेरे ख़्वाब हक़ीक़त में ढाल आए हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ख़्वाब वो ख़्वाब कि हो जिस तमाज़त का फ़ुसूँ-ज़ाद
ख़्वाब वो ख़्वाब कि बन जाए शिकस्त-ए-बे-दाद
किश्वर नाहीद
नज़्म
ये तीरा बज़्म-ए-जहाँ ये शिकस्त-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र
महल बनाए हैं क़ारूनियों ने लाशों पर