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नज़्म
माहिर-उल क़ादरी
नज़्म
जो मुस्कुराहट हमारे चेहरे को देख कर उन लबों पे आती
जबीं की शिकनों में ढल चुकी है
ज़हीर मुश्ताक़ राना
नज़्म
मुफ़्लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
सैकड़ों सुल्तान-ए-जाबिर हैं नज़र के सामने