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नज़्म
ये तिरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द
अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शिद्दत-ए-कर्ब में डूबी हुई मेरी गुफ़्तार
मैं कि ख़ुद अपने मज़ाक़-ए-तरब-आगीं का शिकार